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लोकसभा चुनाव" के प्रत्याशी के लिए आदर्श आवेदन पत्र
"लोकसभा चुनाव" के प्रत्याशी के लिए आदर्श आवेदन पत्र
1. उम्मीदवार का नाम: ____________ _________
2.वर्तमान पता:
(I.) जेल का नाम: ____________ _________
(ii.) सेल नंबर: ____________ _________
3.राजनैतिक पार्टी: ____________ _________
* आप अभी तक जिन दलों में शामिल थे उनमें से केवल पिछले पांच दलों का नाम दें
4.राष्ट्रीयता :
A-इतालवी
B – भारतीय
5 पिछली पार्टी छोड़ने के कारण (एक या अधिक को सर्कल करें ) :
A-भीतरघात
B- निष्कासित
C-खरीद लिये गये
D ऊपर से कोई नहीं
E सभी
6.चुनाव लड़ने के लिए कारण (एक या अधिक को सर्कल करें ) :
A-पैसा बनाने के लिए
B- अदालत के मुकदमे से बचने के लिए
C- सत्ता का घोर दुरुपयोग करने के लिए
D-जनता की सेवा करने के लिए
E-मैं नहीं जानता
(यदि आपका उत्तर D है तो अपनी विवेकशीलता के लिये एक मान्यता प्राप्त सरकारी मनोचिकित्सक से प्रमाणपत्र संलग्न करें)
7 आपको कितने साल का जन सेवा का अनुभव है?
A- 1-2 साल
B- 2-6 साल
C- 6-15 साल
D- 15 + साल
8. आप के खिलाफ लंबित किसी भी आपराधिक मामले का विवरण दें (पूरी जानकारी देने के लिये आप जितने चाहे उतने अतिरिक्त पृष्ट जोड़ सकते हैं)
9.आपने कितने वर्ष जेल में बिताए हैं?
(कृप्या प्रश्न 7 से भ्रमित न हों)
A- 1-2 साल
B- 2-6 साल
C- 6-15 साल
D- 15 + साल
10.आप किसी वित्तीय घोटाले में शामिल हैं?
A-क्यों नहीं
B- बेशक
C- निश्चित रूप से
D- मैं इस सब से इनकार करता हूं
E- मुझे इसमें एक विदेशी हाथ दिखता है
11. आपकी वार्षिक भ्रष्टाचार आय क्या है?
A-100-500 करोड़
B-500-1000 करोड़
C-कोई गिनती नहीं …
(हवाला में डालर से की गयी कमाई को रुपयों में कनवर्ट करने के बाद शामिल करें)
12. क्या आपके मन में भारत के लिए कोई भी विकास योजना है?
A नहीं
B नहीं
C नहीं
D नहीं
13 नीचे दिये गये स्थान में अपनी उपलब्धियों का बखान करें:
[_________]
(सार्वजनिक हित में जारी एक ईमेल से प्रेरित)
पारसी थियेटर, मुग़ले आज़म और माचिस की तीलियां
कुछ दिनों से टीवी पर खूब फिल्में देखी जा रही हैं। हर शाम समाचार चैनलों या इंटरनेट पर समय बिताने के बजाय कुछ अच्छी फिल्में देखने की कोशिश कर रहा हूं।
परसों टीवी पर मुग़लेआज़म देखी। नयी तकनीक से इसे पूरी तरह रंगीन और डिजिटल सर्रांउंड साउंड में बना दिया गया है। फिल्म के भव्य सैट रंगीन होने के बाद और भी भव्य और शानदार दिख रहे हैं। हैरान हो देखता रहा कि श्वेत श्याम रंगों में फिल्मायी गयी फिल्म में कैसे रंग भर कर गहनों, कपड़ों और फूलों की बारीक खूबसूरती को उभारा गया है। आपने यदि यह फिल्म रंगों में न देखी हो तो जरूर देखें।
फिल्म की खास संवाद अदायगी के बारे में बच्चों को बताता रहा कि जिस तरह के लंबे लंबे डायलॉग ड्रामाई अंदाज़ से बोले जा रहे हैं यह पारसी ड्रामों से आया हैं। बच्चों को बता रहा था सोहराब मोदी के बारे में कि कैसे वो अपनी जानदार आवाज में पारसी थियेटर के अंदाज़ में संवाद बोला करते थे। फिल्म में जब विज्ञापन आते तो आदत अनुसार रिमोट का बटन दबता और समाचार चैनल लग जाता। वहां हम सोहराब मोदी के पारसी थियेटर की बात कर रहे थे और यहां सोनिया और मोदी की नौटंकी चल रही थी। मौत के सौदागर जैसे डायलॉग चल रहे थे। स्टूडियो में बैठे दोनो तरफ के नेता खूब नफरतें उगल रहे थे और एंकर बीच बीच में माचिस की तीलियां छोड़ रहे थे।
कल शाम जब काम से वापिस आ रहा था तो एफएम गोल्ड पर क्रिकेट मैच के बाद ’माचिस’ का गीत बज रहा था।
दिल दर्द का टुकड़ा है पत्थर की डली सी है
इक अंधा कुआं है या बंद गली सी है
इक छोटा सा लम्हा है जो खत्म नहीं होता
मैं लाख बुझाता हूं ये भस्म नहीं होता…..
नफरतें फैला कर राजनीति करने वालों पर गुलजार साहब की बहुत अच्छी टिप्पणी है माचिस। गीत दिमाग में अटक सा गया। घर पहुंचा तो बिजली गुल थी। मैं बाजार की और निकल गया। वापसी पर कदम अपने आप एक सीडी की दुकान में घुस गये। सामने एक दो अंग्रेजी फिल्मों के बीच अनारा पर बनी फिल्म की सीडी पड़ी थी। कवर पर बड़ा सा मोबाइल बना था जिसमें एम एम एस चलता दिखाया था।
मैं कुछ सीडियां छांटने लगा। एक के बाद एक सीडी पर गोविंदा, मिथुन, या संजय दत्त कोइ न कोइ बंदूक लिये खड़े थे। दुकानदार लड़का जो कि थोड़ा पिये हुए भी था बोला ’आपको किस टाइप की फिल्म चाहिए?’ उम्मीद तो नहीं थी कि वहां आंधी, मासूम या मौसम जैसी कोइ फिल्म मिल जायेगी फिर भी बोल दिया ’कोइ गुलजार टाइप।’
’वो कौन है?’ लड़का हैरान था। सामने सीडी पर अनारा जोर से हंसने लगी।
मुझे एक बंडल में माचिस की सीडी मिल गयी। वो भी शायद वहां इस लिये थी क्योंकि कवर पर चंद्रचूड़ सिंह के हाथ में बंदूक थी। दिमाग में पहले ही शाम से ’छोड़ आये हम वो गलियां…’ बज रहा था। घर आ कर देखने लगा। पहली सीडी खत्म हुइ तो दूसरी के चलने तक हाथ फिर रिमोट पर गया और NDTV लग गया। एक कार्यक्र्म समाप्त करते हुए प्रणव अंग्रेजी में बता रहे थे कि मोदी अपनी सभाओं में किसी मोहन लाल का बार बार नाम लेते हैं। कोई जा कर उन्हें बताये कि वो मोहन लाल नहीं मोहन दास है। उसके बाद जो क्लिप चली उसमें मोदी ने जो गुजराती में कहा वह तो समझ नहीं आया पर जो नाम मोदी ने लिया वो था ’ मोहन लाल करमचंद गांधी।’
राजनीति के ’पिंजर’ में फंसा लोकतंत्र
अमृता प्रीतम का उपन्यास ’पिंजर’ मैंने तब पढ़ा था पहली बार जब में स्कूल में ही था। उसके बाद जाने कितनी ही बार पढ़ लिया। आज जब हम आजादी की सालगिरह मना रहे हैं तो मन कहता है कि इस उपन्यास के बारे में कुछ लिखूं। बंटवारे की पृष्टभूमी पर लिखे गये इस उपन्यास पर फिल्म भी बन चुकी है। आप ने यदि यह उपन्यास नहीं पढ़ा और यदि इन्सानी दुखों से आपके हृदय पर सिलवटें पड़ती हैं तो इस उपन्यास को जरूर पढ़ें। यह उपन्यास आपके अस्तिस्व और आपकी सोच पर एक गहरा असर जरूर छोड़ कर जायेगा। जब मैंने पढ़ा तो कच्ची उम्र थी मेरी। उपन्यास का असर और भी गहरा हुआ।
पिंजर कहानी है बंटवारे से पूर्व के हिंन्दुस्तान के पंजाब के एक गांव कि लड़की पूरो के दुखों की। हालांकि उपन्यास पूरी तरह पूरो की कहानी कहता है मगर साथ ही आपको उस समय की राजनैतिक हलचलों के कारण हो रहे घटनाक्रम के प्रभावों से बेचैन कर देता है। पूरे उपन्यास में अमृता जी ने कहीं भी कोई राजनैतिक बयान नहीं दिया, कहीं कोई पात्र कोई राजनैतिक वाक्य नहीं बोलता, मगर जैसे जैसे आप कहानी को पढ़ते जाते हैं, आपके अंदर एक गुस्सा उत्पन्न होता जाता है। आप जैसे जैसे पूरो के दुखों को पढ़ते हैं आप के अंदर वो गुस्सा धधकने लगता है, आप नफरत करने लगते हैं दुनिया भर के उन जिन्नाओं और नैहरूओं से जो अपनी अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं के कारण जमीनों, देशों, समाजों और लोगों में बंटवारे करवाते हैं।
दुख की बात यह है की आज भी हमारे राजनेता यही कर रहे हैं। आपने मेरी कई पोस्टों में यह महसूस किया होगा कि मेरे मन में सभी राजनीतीबाजों के लिये एक नफरत हमेशा से रही है। यह बात सही है कि हमारा लोकतंत्र एक मजबूत लोकतंत्र है मगर हमारे राजनेता अभी भी जाति, धर्म और वर्गों के नाम पर हमें बांट रहे हैं। जातियों और धर्म के नाम पर चुनावों में टिकट दिये जाते हैं और जातियों और धर्मों के नाम पर ही चुनाव जीते जाते हैं। क्या हमारे बुजुर्गों ने इसी जातियों, धर्मों, वर्गों और भाषाओं में बंटे हुए लोकतंत्र का सपना देखा था?
अफसोस तो यह है कि सत्ता के लिये नफरत की यह कहानियां अभी भी दोहरायी जाती हैं। कभी दिल्ली में तो कभी गुजरात में ।
इसी उपन्यास से एक अंश:
(साफ न पढ़ पा रहे हों तो इमेज पर क्लिक करें)
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मंटो की कहानी – टोबा टेक सिंह
बंटवारे के दो तीन साल बाद पाकिस्तान और हिंदुस्तान की हुकूमतों को ख्याल आया कि इखलाकी क़ैदियों की तरह पागलों का तबादला भी होना चाहिए यानी जो मुसल्मान पागल, हिंदुस्तान के पागल-ख़ानों में हैं उन्हें पकिस्तान पहुंचा दिया जाए और जो हिंदू और सिख पाकिस्तान के पागल-ख़ानों में हैं उन्हे हिंदुस्तान के हवाले कर दिया जाए।मालूम नहीं यह बात माक़ूल थी या ग़ैर-माक़ूल , बहर-हाल दानिश-मन्दों के फ़ैस्ले के मुताबिक़ इधर उधर ऊंची सतह की कान्फ्रेंसे हुईं , और बाल-आख़िर एक दिन पागलों के तबादले के लिए मुक़र्रर हो गया। अच्छी तर्ह छान-बीन की गई। वह मुसल्मान पागल जिन के लवाहिक़ीन हिंदुस्तान में ही में थे, वहीं रह्ने दिए गए थे, जो बाक़ी थे उन को सर्हद पर रवाना कर दिया गया।_ यहां पाकिस्तान में चूंकि क़रीब क़रीब तमाम हिंदू सिख जा चुके थे, इस लिए किसी को रखने रखाने का सवाल ही न पैदा हुआ। जितने हिंदू सिख पागल थे, सब के सब पुलिस की हिफ़ाज़त में बॉर्डर पर पहुंचा दिए गए।
उधर का मालूम नहीं, लेकिन इधर लाहोर के पागल-ख़ाने में जब उस तबादले की ख़बर पहुंची तो बड़ी दिल्चस्प चिह-मी-गूइयां होन लगीं। एक मुसल्मान पागल जो बारह बरस से हर रोज़ बा-क़ाइदगी के साथ ” ज़मीन्दार ” पढ़्ता था उस से जब उस के एक दोस्त ने पूछा ” मोल्बी साब , यह पाकिस्तन क्या होता है”,उस ने बड़े ग़ोर-ओ-फ़िक्र के बाद जवाब दिया,” हिंदुस्तान में एक ऐसी जगह है जहां उस्तरे बन हैं।”यह जवाब सुन कर उस का दोस्त मुत्मईन हो गया।उसी तरह एक सिख पागल ने एक दूसरे सिख पागल से पूछा “सरदार-जी हमें हिंदुस्तान क्यूं भेजा जा रहा है — हमें तो वहां की बोली नहीं आती?”दूसरा मुस्कुराया ” मुझे तो हिंदुस्तोड़ो की बोली आती है — हिंदुस्तानी बड़े शैतानी आकड़ आकड़ फिर्ते हैं।”एक दिन नहाते नहाते एक मुसल्मान पागल ने ” पाकिस्तान जिंदाबाद ” का नारा इस ज़ोर से बुलंद किया कि फर्श पर फिसल कर गिरा और बेहोश हो गया ।
बाज़ पागल ऐसे भी थे जो पागल नहीं थे। उन में अक्सरियत ऐसे क़ातिलों की थी जिन के रिश्तेदारों ने अफ़्सरों को दे दिला कर पागल-ख़ाने भिज्वा दिया था कि फांसी के फंदे से बच जाएं। यह कुछ कुछ समझ्ते थे कि हिंदुस्तान क्यूं तक़्सीम हुआ है और यह पाकिस्तान क्या है? लेकिन सही वाक़िआत से यह भी बे-ख़बर थे। अख़बारों से कुछ पता नहीं चलता था और पहरेदार सिपाही अनपढ़ और जाहिल थे। उन की गुफ़्तगू से भी वह कोई नतीजा बरामद नहीं कर सकते थे। उन को सिर्फ़ इतना मालूम था कि एक आद्मी मुहम्मद अली जिन्ना है जिस को काइदे आजम कह्ते हैं। उस ने मुसल्मानों के लिए एक `इलाहिदा मुल्क बनाया है जिस का नाम पाकिस्तान है। यह कहां है , उस का मह्ल्ल-ए वुक़ू` क्या है। उस के मुताल्लिक़ वह कुछ नहीं जान्ते थे। यही वजह है कि पागल-ख़ाने में वह सब पागल जिन का दिमाग़ पूरी तरह माऊफ़ नहीं हुआ था इस मख़्मसे में गिरफ़्तार थे कि वह पाकिस्तान में हैं या हिंदुस्तान में? अगर हिंदुस्तान में हैं तो पाकिस्तान कहां है? अगर वह पाकिस्तान में हैं तो यह कैसे हो सकता है कि वह कुछ अरसा पह्ले यहीं रह्ते हुए भी हिंदुस्तान में थे।
एक पागल तो पाकिस्तान और हिंदुस्तान, और हिंदुस्तान और पाकिस्तान के चक्कर में कुछ ऐसा गिरफ़्तार हुआ कि और ज़ियादा पागल हो गया। झाड़ू देते देते एक दिन दरख़्त पर चढ़ गया और टह्नी पर बैठ कर दो घंटे मुसल्सल तक़्रीर कर्ता रहा जो पाकिस्तान और हिंदुस्तान के नाज़ुक मसले पर थी। सिपाहियों ने उसे नीचे उतरने को कहा तो वह और ऊपर चढ़ गया। डराया धमकाया गया तो उस ने कहा — ” मैं हिंदुस्तान में रह्ना चाहता हूं न पाकिस्तान में — मैं इस दरख़्त ही पर रहूंगा।”बड़ी मुश्किलों के बाद जब उस का दौरा सर्द पड़ा तो वह नीचे उतरा और अपने हिन्दू सिख दोस्तों से गले मिल मिल कर रोने लगा, इस ख्याल से उस का दिल भर आया था कि वह उसे छोड़ कर हिंदुस्तान चले जाएंगे।
एक एम एस सी पास रेडियो इन्जीनियर में जो मुसल्मान था और दूसरे पागलों से बिल्कुल अलग थलग बाग़ की एक ख़ास रविश पर सारा दिन ख़ामोश टहलता रह्ता था यह तबदीली नमूदार हुई कि उस ने तमाम कप्ड़े उतार कर दफ़`अदार के हवाले कर दिए और नन्ग धड़न्ग सारे बाग़ में चलना फिरना शुरू` कर दिया।
चन्योट के एक मोटे मुसल्मान पागल ने जो मुस्लिम लीग का सर-गर्म कार्कुन रह चुका था और दिन में पन्द्रह सोलह मर्तबा नहाया करता था यक-लख़्त यह आदत तर्क कर दी। उस का नाम मुहम्मद अली था। चुनांचे उस ने एक दिन अपने जंगले में एलान कर दिया कि वह काइदे आजम मुहम्मद अली जिन्ना है। उस की देखा देखी एक सिख पागल मास्टर तारा सिंघ बन गया। क़रीब था कि उस जंगले में ख़ून ख़राबा हो जाए मगर दोनों को ख़तर्नाक पागल क़रार दे कर `अलाहिदा `अलाहिदा बंद कर दिया गया।
लाहोर का एक नौजवान हिंदू वकील था जो मुहब्बत में ना-काम हो कर पागल हो गया था। जब उस ने सुना कि अमृतसर हिंदुस्तान में चला गया है तो उसे बहुत दुख हुआ। उसी शह्र की एक हिन्दू लड़्की से उसे मुहब्बत हो गई थी। गो उस ने उस वकील को ठुकरा दिया था मगर दीवानगी की हालत में भी वह उस को नहीं भूला था। चुनांचे उन तमाम हिन्दू और मुस्लिम लीडरों को गालियां देता था जिन्हों ने मिल मिला कर हिंदुस्तान के दो टुक्ड़े कर दिए। — उस की मह्बूबा हिंदुस्तानी बन गई और वह पाकिस्तानी।
जब तबादले की बात शुरू` हुई तो वकील को कई पागलों ने समझाया कि वह दिल बुरा न करे। उस को हिंदुस्तान भेज दिया जाएगा। उस हिंदुस्तान में जहां उस की मह्बूबा रह्ती है। मगर वह लाहोर छोड़्ना नहीं चाह्ता था। इस लिए कि उस का ख्याल था कि अमृतसर में उस की प्रेक्टिस नहीं चलेगी।
यूरोपियन वार्ड में दो ऐंग्लो-इन्डियन पागल थे। उन को जब मालूम हुआ कि हिंदुस्तान को आज़ाद कर के अन्ग्रेज़ चले गए हैं तो उन को बहुत सदमा हुआ| वह छुप छुप कर घंटों आपस में इस अहम मसले पर गुफ़्तगू करते रह्ते कि पागल-ख़ाने में उन की हैसियत किस क़िस्म की होगी। यूरोपियन वार्ड रहेगा या उड़ा दिया जाएगा। ब्रेकफ़ास्ट मिला करेगा या नहीं। क्या उन्हें डबल रोटी के बजाए बलडी इन्डियन चपाटी तो ज़ह्र मार नहीं करना पड़ेगी?
एक सिख था जिस को पागल-ख़ाने में दाख़िल हुए पन्द्रह बरस हो चुके थे। हर वक़्त उस की ज़बान से यह `अजीब-ओ-ग़रीब अल्फ़ाज़ सुन्ने में आते थे _ ” ऊपड़ दी गुड़ गुड़ दी एनक्स दी बे ध्याना दी मुंग दी दाल आफ़ दी लालटेन।” दिन को सोता था न रात को। पहरेदारों का यह कह्ना था कि पन्द्रह बरस के तवील अर्से में वह एक लह्ज़े के लिए भी नहीं सोया। लेटता भी नहीं था। अलबत्ता कभी कभी किसी दीवार के साथ टेक लगा लेता था।
हर वक़्त खड़े रह्ने से उस के पांव सूज गए थे। पिंडलियां भी फूल गई थीं। मगर इस जिस्मानी तकलीफ़ के बावजूद लेट कर आराम नहीं कर्ता था। हिंदुस्तान , पाकिस्तान और पागलों के तबादिले के मुत्तालिक जब कभी पागल-ख़ाने में गुफ़्तगू होती थी तो वह ग़ोर से सुन्ता था। कोई उस से पूछ्ता कि उस का क्या ख़ियाल है तो वह बड़ी सन्जीदगी से जवाब देता” ऊपड़ दी गुड़ गुड़ दी एनकस दी बे ध्याना दी मूंग दी दाल आफ़ दी पाकिस्तान गवर्न्मन्ट।”
लेकिन बाद में ” आफ़ दी पाकिस्तान गवर्न्मन्ट” की जगह ” आफ़ दी टोबा टेक सिंघ गवर्न्मन्ट” ने ले ली और उस ने दूसरे पागलों से पूछ्ना शुरू किया कि टोबा टेक सिंघ कहां है जहां का वह रह्ने वाला है। लेकिन किसी को भी मालूम नहीं था कि वह पाकिस्तान में है या हिंदुस्तान में। जो बताने की कोशिश करते थे वह खुद इस उलझावों में गिरिफ़्तार हो जाते थे कि सियालकोट पह्ले हिंदुस्तान में होता था पर अब सुना है कि पाकिस्तान में है। क्या पता है कि लाहोर जो अब पाकिस्तान में है कल हिंदुस्तान में चला जाए। या सारा हिंदुस्तान ही पाकिस्तान बन जाए। और यह भी कौन सीने पर हाथ रख कर कह सकता था कि हिंदुस्तान और पाकिस्तान दोनों किसी दिन सिरे से गायब ही हो जाएं।
इस सिख पागल के केस छिदरे हो के बहुत मुख़्तसर रह गए थे| चूंकि बहुत कम नहाता था इस लिए दाढ़ी और सर के बाल आपस में जम गए थे। जिन के बाइस उस की शक्ल बड़ी भयानक हो गई थी। मगर आद्मी बे-ज़रर था। पन्द्रह बरसों में उस ने कभी किसी से झगड़ा फ़साद नहीं किया था। पागल-ख़ाने के जो पुराने मुलाज़िम थे वह उस के मुत्तलिक इतना जानते थे कि टोबा टेक सिंह में उस की कई ज़मीनें थीं। अच्छा खाता पीता ज़मीन-दार था कि अचानक दिमाग़ उलट गया। उस के रिश्तेदार लोहे की मोटी मोटी ज़न्जीरों में उसे बांध कर लाए और पागल-ख़ाने में दाख़िल करा गए।
महीने में एक बार मुलाक़ात के लिए यह लोग आते थे और उस की ख़ैर ख़ैरियत दर्याफ़्त कर के चले जाते थे। एक मुद्दत तक यह सिलसिला जारी रहा। पर जब पाकिस्तान , हिंदुस्तान की गड़बड़ शुरू हुई तो उन का आना बन्द हो गया।
उस का नाम बिशन सिंघ था मगर सब उसे टोबा टेक सिंघ कह्ते थे। उस को इतना मालूम नहीं था कि दिन कौन सा है , महीना कौन सा है , या कितने साल बीत चुके हैं। लेकिन हर महीने जब उस के अज़ीज़-ओ-अक़ारिब उस से मिलने के लिए आते थे तो उसे अपने आप पता चल जाता था। चुनांचे वह दफादार से कह्ता कि उस की मुलाक़ात आ रही है। उस दिन वह अच्छी तरह नहाता , बदन पर ख़ूब साबुन घिसता और सर में तेल लगा कर कंघा करता , अपने कपड़े जो वह कभी इसतेमाल नहीं करता था निकलवा के पहनता और यूं सज बन कर मिलने वालों के पास जाता। वह उस से कुछ पूछ्ते तो वह ख़ामोश रह्ता या कभी कभार ” ऊपड़ दी गुड़ गुड़ दी एनकस दी बे ध्याना दी मूंग दी दाल आफ़ दी लाल्टेन ” कह देता।
उस की एक लड़्की थी जो हर महीने एक उंगली बढ़ती बढ़ती पन्द्रह बरसों में जवान हो गई थी। बिशन सिंघ उस को पहचानता ही नहीं था। वह बच्ची थी जब भी अपने बाप को देख कर रोती थी , जवान हुई तब भी उस की आंखों से आंसू बह्ते थे।
पाकिस्तान और हिंदुस्तान का क़िस्सा शुरू` हुआ तो उस ने दूसरे पागलों से पूछ्ना शुरू` किया कि टोबा टेक सिंघ कहां है? जब इत्मीनान-बख़्श जवाब न मिला तो उस की कुरेद दिन-बदिन बढ़्ती गई। अब मुलाक़ात भी नहीं आती थी। पह्ले तो उसे अपने आप पता चल जाता था कि मिलने वाले आ रहे हैं , पर अब जैसे उस के दिल की आवाज़ भी बन्द हो गई थी जो उसे उन की आमद की ख़बर दे दिया करती थी।
उस की बड़ी ख़्वाहिश थी कि वह लोग आएं जो उस से हम-दर्दी का इज़हार करते थे और उस के लिए फल , मिठाइयां और कपड़े लाते थे। वह अगर उन से पूछ्ता कि टोबह टेक सिंघ कहां है तो वह यक़ीनन उसे बता देते कि पाकिस्तान में है या हिंदुस्तान में। क्योंकि उस का ख्याल था कि वह टोबा टेक सिंघ ही से आते हैं जहां उस की ज़मीनें हैं।
पागल-ख़ाने में एक पागल ऐसा भी था जो खुद को ख़ुदा कह्ता था। उस से जब एक रोज़ बिशन सिंघ ने पूछा कि टोबा टेक सिंघ पाकिस्तान में है या हिंदुस्तान में , तो उस ने हस्ब-ए `आदत क़ह्क़हा लगाया और कहा “वह पाकिस्तान में है न हिंदुस्तान में, इस लिए कि हम ने अभी तक हुक्म नहीं दिया। “
बिशन सिंघ ने इस ख़ुदा से कई मरतबा बड़ी मिन्नत समाजत से कहा कि वह हुक्म दे दे ताकि झंझट ख़त्म हो मगर वह बहुत मसरूफ़ था इसलिए कि उसे और बे-शुमार हुक्म देने थे। एक दिन तन्ग आ कर वह उस पर बरस पड़ा “ऊपड़ दी गुड़ गुड़ दी एनक्स दी बे ध्याना दी मुंग दी दाल आफ़ वाहे गूरू जी दा ख़ालसा ऐंड वाहे गूरू जी की फ़तह — जो बोले सो निहाल , सत सरी अकाल।”
उस का शायद यह मतलब था कि तुम मुसल्मानों के ख़ुदा हो — सिखों के ख़ुदा होते तो ज़रूर मेरी सुनते ।
तबादले से कुछ दिन पहले टोबा टेक सिंघ का एक मुसल्मान जो उस का दोस्त था मुलाक़ात के लिए आया। पह्ले वह कभी नहीं आया था। जब बिशन सिंघ ने उसे देखा तो एक तरफ़ हट गया और वापस जाने लगा। मगर सिपाहियों ने उसे रोका ” यह तुम से मिलने आया है — तुम्हारा दोस्त फ़ज़ल दीन है। “
बिशन सिंघ ने फ़ज़ल दीन को एक नज़र देखा और कुछ बड़बड़ाने लगा। फ़ज़ल दीन ने आगे बढ़ कर उस के कन्धे पर हाथ रखा”मैं बहुत दिनों से सोच रहा था कि तुम से मिलूं लेकिन फ़ुरसत ही न मिली, तुम्हारे सब आदमी ख़ैरियत से हिंदुस्तान चले गए थे, मुझ से जितनी मदद हो सकी , मैं ने की, तुम्हारी बेटी रूप कौर . . . . “
वह कुछ कह्ते कह्ते रुक गया। बिशन सिंघ कुछ याद करने लगा ” बेटी रूप कौर ” _
फ़ज़ल दीन ने रुक रुक कर कहा ” हां . . . . वह . . . . वह भी ठीक ठाक है — उन के साथ ही चली गई थी। “
बिशन सिंघ ख़ामोश रहा। फ़ज़ल दीन ने कह्ना शुरू` किया_ ” उंहों ने मुझ से कहा था कि तुम्हारी ख़ैर ख़ैरियत पूछ्ता रहूं — अब मैं ने सुना है कि तुम हिंदुस्तान जा रहे हो — भाई बल्बेसर सिंघ और भाई वधावा सिंघ से मेरा सलाम कह्ना — और बहन अमरित कौर से भी . . . . भाई बल्बेसर से कह्ना, फ़ज़ल दीन राज़ी खुशी है — वह भूरी भैंसें जो वह छोड़ गए थे, उन में से एक ने कट्टा दिया है — दूस्री के कट्टी हुई थी पर वह छह दिन की हो के मर गई . . . . और . . . . मेरी लाइक़ जो ख़िद्मत हो , कहना , मैं हर वक़्त तैयार हूं . . . . और यह तुम्हारे लिए थोड़े से मरूंडे लाया हूं। “
बिशन सिंघ ने मरूंडों की पोटली ले कर पास खड़े सिपाही के हवाले कर दी और फ़ज़ल दीन से पूछा “टोबा टेक सिंघ कहां है ?”
फ़ज़ल दीन ने क़द्रे हैरत से कहा ” कहां है? — वहीं है जहां था “
बिशन सिंघ ने फिर पूछा ” पाकिस्तान में या हिंदुस्तान में ? “
” हिंदुस्तान में — नहीं नहीं पाकिस्तान में ” फ़ज़ल दीन बोखला सा गया।
बिशन सिंघ बड़्बड़ाता हुआ चला गया _ ” ऊपड़ दी गुड़ गुड़ दी एनक्स दी बे ध्याना दी मुंग दी दाल आफ़ दी आफ़ दी पाकिस्तान ऐंड हिंदुस्तान आफ़ दी दूर फिटे मुंह ! “
तबादले के तैयारियां मुकम्मल हो चुकी थीं। इधर से उधर और उधर से इधर आने वाले पागलों की फ़हरिस्तें पहुंच गई थीं और तबादले का दिन भी मुक़र्रर हो चुका था।
।
सख़्त सर्दियां थीं जब लाहोर के पागल-ख़ाने से हिन्दू सिख पागलों से भरी हुई लारियां पुलिस के मुहाफ़िज़ दस्ते के साथ रवाना हुई मुत्तलिक अफ़सर भी हमराह थे। वाघा के बार्डर पर तरफ़ैन के सुपरिंटेडेंट एक दूसरे से मिले और इब्तिदाई कारवाई ख़त्म होने के बाद तबादला शुरू` हो गया जो रात भर जारी रहा।
पागलों को लारियों से निकालना और दूसरे अफ़सरों के हवाले करना बड़ा कठिन काम था। बाज़ तो बाहर निकलते ही नहीं थे। जो निकलने पर रज़ा-मन्द होते थे, उन को संभालना मुश्किल हो जाता था, क्योंकि इधर उधर भाग उठते थे , जो नन्गे थे उन को कप्ड़े पनाए जाते तो वह फाड़ कर अपने तन से जुदा कर देते। कोई गालियां बक रहा है, कोई गा रहा है, _ आपस में लड़ झगड़ रहे हैं, _ रो रहे हैं , बिलख रहे हैं, कान पड़ी आवाज़ सुनाई नहीं देती थी, पागल औरतों का शोर-ओ-ग़ौग़ा अलग था और सर्दी इतनी कड़ाके की थी कि दांत से दांत बज रहे थे ।
पागलों की अकसरियत इस तबादले के हक़ में नहीं थी। इसलिए कि उन की समझ में नहीं आता था कि उंहें अपनी जगह से उखाड़ कर कहां फेंका जा रहा है। वह चन्द जो कुछ सोच समझ सकते थे ” पाकिस्तान जिंदाबाद” और ” पाकिस्तान मुर्दाबाद” के नारे लगा रहे थे। दो तीन मर्तबा फ़साद होते होते बचा , क्योंकि बाज़ मुसल्मानों ओर सिखों को यह नारे सुन कर तेश आ गया था।
बिशन सिंघ की बारी आई और वाघा के उस पार मुत्तलिक अफ़सर उस का नाम रिजिस्टर में दरज करने लगा तो उस ने पूछा ” टोबा टेक सिंघ कहां है? — पाकिस्तान में या हिंदुस्तान में ? “
मुत्तलिक अफ़सर हंसा ” पाकिस्तान में “
यह सुन कर बिशन सिंघ उछल कर एक तरफ़ हटा और दौड़ कर अपने बाक़ी मांदह साथियों के पास पहुंच गया। पाकिस्तानी सिपाहियों ने उसे पकड़ लिया और दूसरी तरफ़ ले जाने लगे , मगर उस ने चलने से इन्कार कर दिया “टोबा टेक सिंघ यहां है — ” और ज़ोर ज़ोर से चिल्लाने लगा _ ” ऊपड़ दी गुड़ गुड़ दी एनक्स दी बे ध्याना दी मुंग दी दाल आफ़ टोबा टेक सिंघ ऐंड पाकिस्तान “
उसे बहुत समझाया गया कि देखो अब टोबा टेक सिंघ हिंदुस्तान में चला गया है,अगर नहीं गया तो उसे फ़ौरन वहां भेज दिया जाएगा। मगर वह न माना। जब उस को ज़बर्दस्ती दूसरी तरफ़ ले जाने की कोशिश की गई तो वह दर्मियान में एक जगह इस अन्दाज़ में अपनि सूजी हुई टांगों पर खड़ा हो गया जैसे अब उसे कोई ताक़त वहां से नहीं हिला सकेगी।
आदमी चूंकि बे-ज़रर था इस लिए उस से मज़ीद ज़बर्दस्ती न की गई , उस को वहीं खड़ा रह्ने दिया गया और तबादले का बाक़ी काम होता रहा।
सूरज निकलने से पहले साकत-ओ-सामत बिशन सिंघ के हल्क़ से एक फ़लक-शिगाफ़ चीख़ निकली। इधर उधर से कई अफ़सर दौड़े आए और देखा कि वह आद्मी जो पन्द्रह बरस तक दिन रात अप्नी टांगों पर खड़ा रहा , औंधे मुंह लेटा है। उधर ख़ारदार तारों के पीछे हिंदुस्तान था, इधर वैसे ही तारों के पीछे पाकिस्तान! दर्मियान में ज़मीन के उस टुकड़े पर जिस का कोइ नाम नहीं था। टोबह टेक सिंघ पड़ा था।
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उनकी आत्महत्या और हमारी आत्मा की हत्या
परसों जब अपने नये चिट्ठे मजेदार समाचार के लिये कुछ मजेदार समाचार खोज रहा था तो एक समाचार पर नजर पड़ी जिसमें जापान के एक मंत्री ने एक घोटाले में नाम आ जाने के कारण शर्म के मारे आत्महत्या कर ली। मुझे पढ़ कर बहुत विस्मय हुआ। जापान इतना प्रगति कर चुका मगर आध्यात्म में हमारे जितनी तरक्की कोई नहीं कर पाया। हमारे यहां मंत्री लोग मंत्री बनने से पहले ही अपनी आत्मा की ही ह्त्या कर लेते हैं। न होगी आत्मा और न होगी आत्मा की आवाज। हमारे यहां तो मंत्री, सांसद या विधायक बनने की पहली शर्त ही यही है कि आपकी आत्मा मर चुकी हो। रही घोटालों की बात तो हमारे यहां तो किसी के पार्षद बनते ही घोटालों में नाम आ जाता है। इसके बाद विधायक, सांसद या मंत्री बनने तक तो बाकायदा कई कई मुकदमे शुरू हो जाते हैं। कई दफा मुकदमे आपराधिक और हत्या तक के भी हो सकते हैं। पिछली बार तो एक केंद्रिय मंत्री को हत्या के जुर्म में उम्र कैद की सजा मिलने पर आनन फानन में इस्तीफा करवाया गया। कई बार तो उम्मीदवार जेल से ही चुनाव लड़ते हैं। आजकल तो जिस किसी पर ज्यादा से ज्यादा घोटालों के आरोप हों वह सांसद या विधायक बनने का सबसे ज्यादा प्रबल उम्मीदवार होता है। मंत्री होने का मतलब ही यही है कि वे अक्सर अदालत आते जाते रहें। इससे उन्हें प्रचार मिलता है और अगले चुनावों में भी विजयी होने के चांस बढ़ते हैं। हमारे न्यूज चैनल वाले भी ऐसे ही मंत्रियों के पीछे पीछे कैमरा ले कर चलते हैं।
कभी आप किसी भी कार्य दिवस में सुबह ग्यारह बजे के आसपास जब अदालतें खुलती हैं उस समय कोइ न्यूज चैनल लगा कर देखिये। किसी न किसी नेता (या अभिनेता) की तारीख लगी होगी अदालत में। पहले तो संवाददाता मंत्री जी के आने से पहले सीधे प्रसारण में मुकदमे की जानकारी देगा। फिर कारों के काफिले के साथ मंत्री जी आयेंगे। मंत्री जी एफटीवी की मॉडल की तरह कैट वॉक करते अदालत के दरवाजे से पहले उस तरफ जायेंगे जहां टीवी के कैमरे खड़े होंगे। पहले मंत्री जी कैमरों की तरफ हाथ हिला कर मुस्कुरायेंगे। फिर दो अंगुलियां फैला कर ‘वी’ का चिन्ह बनायेंगे। फिर अपनी चिरप्रतीक्षित बाईट देंगे। मंत्री जी अपनी पहली लाइन में अपने विरोधियों पर निशाना साधेंगे कि यह सब हमारे विरोधियों की चाल है। अब यहां यह स्पष्ट करदें कि यह विरोधी, विरोधी दल वाले भी हो सकते हैं या फिर उनके अपने दल में भी हो सकते हैं जो कि उन्हें मंत्री बनाये जाने का सिर्फ इस लिये विरोध कर रहे होते हैं कि वो हटें तो हम बनें। दूसरी लाइन में मंत्री जी अपने समुदाय या जाति की दुहाई देंगे कि हमारे समुदाय को आगे बढ़ने से रोकने के लिये यह सब किया जा रहा है। अब यहां यह ध्यान देने लायक बात है कि मंत्री जी इसी जाति या समुदाय का नाम लेकर चुनाव जीते थे और इसी जाति के कोटे से मंत्री भी बने थे। तीसरी लाइन में मंत्री जी बतायेंगे कि उनके खिलाफ कोई आरोप सिद्ध नहीं होगा क्योंकि उन्होंने कोइ सबूत छोड़ा ही नहीं। हम इस मुकदमे से बेदाग होकर निकलेंगे। इसके बाद सर्फ एक्सेल का विज्ञापन “दाग अच्छे हैं ना!”
कभी कभी तो मैं सोचता हूं कि हमारे नेता यदि घोटाले न करें या हमारे अभिनेता कहीं से लाकर हथियार न छुपायें तो हमारे न्यूज चैनल वाले सारा दिन अपने चैनल पर क्या दिखायेंगे? अब मीका सिंह और रिचर्ड गेयर रोज रोज तो लड़कियां चूमते नजर नहीं ना आयेंगे।
अभिनेता जब अदालत में आता है तो सीन जरा अलग सा होता है। वो अपनी जींस में और लाल नीली शर्ट में ऊपर के दो बटन खोले चुपचाप आंखे झुकाये कैमरे के सामने से अदालत की और चला जायेगा। माथे पर सुबह मंदिर से लगवाया लंबा चंदन का टीका होगा। यहां बाईट उनके फैन देते हैं “सो क्यूट, कितने हैंडसम लग रहे थे ना?” उसके बाद रीड एंड टेलर का विज्ञापन “लम्हों को लिबास दे।”
एक अभिनेता पर पंद्र्ह साल मुकदमा चल जाये, उसका फिल्म निर्माता इस बीच लगातार पांच छः फिल्में बना कर अरबपती बन जाये। टुन्ना भाई लगे रहो, टुन्ना भाई अमेरिका में, टुन्ना भाई चांद पर।
हां तो बात मंत्री की आत्महत्या और आत्मा की हत्या की हो रही थी। हमारे यहां मंत्री द्वारा आत्महत्या का कोइ इतिहास नहीं है। हां उन्हे चुनने वाली जनता अकसर आत्महत्या करती पाई जाती है। किसी भी दिन का अखबार उठा कर देख लीजिये। देश के कई हिस्से मिल जायेंगे जहां आये दिन किसान आत्महत्यायें कर रहे हैं। खुद से न मरें तो पुलिस की गोलियां किस लिये हैं, कभी सिंगूर में किसानों की जमीन के नाम पर तो कभी बूंदी, दौसा में आरक्षण के नाम पर।
हां हमारे यहां यदि कोई बिना किसी घोटाले के पांच साल तक मंत्री बना रह जाये तो शर्म के मारे आत्महत्या जरूर कर ले।




