Archive

Archive for the ‘अर्थव्यवथा’ Category

इकनॉमिक टाइम्स अब हिंदी में भी

आज सुबह उठ जब बाहर से अखबार उठाये तो एक सुखद एहसास मेरा इंतजार कर रहा था। रोज के अखबारों के साथ एक अखबार अतिरिक्त था। यह था इकनॉमिक टाइम्स का हिंदी संस्करण।

इकनॉमिक टाइम्स का हिंदी में छपना केवल एक नये अखबार का लॉंच नहीं है, यह देश के बदलते आर्थिक परिदृश्य और हिंदी को अर्थ और बाजार में मिलते महत्व को भी दर्शाता है।

यूटीवी पर होगा डिज्नी का कब्जा, टीवीएस  की नयी बाइक पर विवाद, फरारी की भारत में शुरुआत, ग्राहकों को लुभाने के लिये ब्लॉग का इस्तेमाल और डीवीडी बाजार में छा रही ब्ल्यूरे तकनीक। इस तरह के समाचारों को हिंदी में पढ़ने का अलग ही मजा है।

उम्मीद है कि शेयर बाजार जैसे विषय अब केवल अंग्रेजी जानने वालों के लिये ही नहीं होंगे और अंग्रेजी न जानने वाले भी अब शेयर बाजारों में अधिक मात्रा में अपने हाथ आजमायेंगे।

अब हिंदी पढ़ने वाले इस अखबार से समृद्ध हों या नहीं इतना तय है कि इस संस्करण से हिंदी कुछ और समृद्ध हुई है।

हां, मुझको एक और अखबार पढ़ने के लिये सुबह सुबह थोड़ा और समय जरूर निकालना पड़ेगा।

बदलाव की हवायें हिंदी की ओर

अक्टूबर 29, 2007 7 comments

बदलाव की हवायें किस तरह इंडिया और भारत को एक दूसरे के करीब ला रही हैं इसका एक उदाहरण देखने को मिला है।

इकॉनॉमिक्स टाइम्स हर साल अपने अखबार के साथ बांटने के लिये एक पत्रिका निकालता है ET500  जिसमें उस साल की 500 टॉप कंपनियों से परिचय करवाया जाता है और आर्थिक बदलावों की झांकी भी पेश की जाती है। इस साल के अंक में जो कि कल यानि 30 अक्टूबर को वितरित किया जायेगा इस पत्रिका की थीम है Winds of Change यानि बदलाव की हवायें।

कैसा बदलाव आ रहा है यह आपको यहां इस पत्रिका का कवर देख कर ही पता चल जायेगा

कैसे बढ़ती शेयर मार्किट कर रही है गरीब के आटा और दाल महंगे

एक ओर जहां शेयर बाजार के जानकार यहां निवेश करके मालामाल हो रहे हैं वहीं बेचारा आम आदमी जिसका इस शेयर बाजार से कुछ लेना देना नहीं है और जो कि अपनी दो जून की रोटी मुशकिलों से जुगाड़ पाता है उस पर इस सब का उल्टा असर हो रहा है और उस गरीब को अपने रोज के आटा दाल के लिये अधिक कीमतें देनी पड़ रही हैं। इस सब की वजह यह है कि अर्थव्यवस्था में बढ़ते मुद्रा विस्तार का प्रबंधन सरकार ठीक से नहीं कर पा रही है और साथ ही सराकार तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था में किसानों को (जो की देश की आबादी का साठ प्रतिशत हैं) शामिल नहीं कर पायी है। कृषी के विकास की निचली दर का सीधा असर खाद्य पदार्थों की पूर्ती पर पड़ा है जिससे खाद्य पदार्थों की कीमतों में बेतहाशा वृद्धी हुई है। गरीब अपनी आय का आधा खर्च अपने खान पान पर करता है जबकी अमीर अपनी आय का दस प्रतिशत से भी कम अपने खान पान पर खर्च करता है, इससे आप समझ सकते हैं कि बढ़ती महंगाई किस पर ज्यादा असर दिखाती है।यह सब कैसे होता है इसे समझने के लिये आईये देसी तथा विदेशी निवेश, मुद्रा के विस्तार, ब्याज की दर और मंहगाई के आपस में रिश्ते को जरा आसान भाषा में समझने की कोशिश करते हैं। जब अर्थव्यवस्था का विकास तेजी से होता है तो अर्थव्यवस्था में मुद्रा का विस्तार भी होने लगता है क्योंकि अर्थव्यवस्था का विस्तार होता है उद्योगों, graph120.pngसेवाओं, नौकरियों और उत्पादों में विस्तार से। इस विस्तार से लोगों को अधिक धन मिलता है जो कि मांग को बढ़ाता है और फिर पूर्ती बढ़ाने के लिये और विस्तार होता है। इस विस्तार में सहयोगी होते है निवेश और ऋण। यहां ध्यान दें कि यह निवेश और ऋण देसी और विदेशी दोनो तरह के हो सकते हैं। इस सब के कारण अर्थव्यवस्था में जयादा लिक्विडिटी(तरलता) आ जाती है यानी मुद्रा का विस्तार अर्थात मुद्रास्फीति। लोगों के हाथ में ज्यादा पैसा अर्थात ज्यादा उत्पादों और सेवाओं की मांग। अब जब इस मांग के बराबर पूर्ती नहीं हो पाती है और बाकी सारे घटक नहीं बदलते हैं तो मंहगाई बढ़ती है। इस महंगाई की बढ़ती दर को रोकने के लिये हाल ही में सरकार नें CRR की दरें बढ़ाईं। CRR यानी कैश रिजर्व रेशो, बैंकों को प्राप्त जमाओं का वह हिस्सा होता है जिसे बैंक, रिजर्व बैंक के पास रखते हैं। मान लीजिये यदि CRR की दर 7 % है और बैंको के पास 100 रुपये जमा हैं तो वे केवल 93 रु का ऋण ही दे पायेंगे। इस प्रकार सरकार मुद्रा के प्रसार में कमी करके अर्थव्यवस्था में मांग की कमी करती है। जब बैंकों के पास ऋण देने के लिये कम पैसा होगा तो बैंक ऋण पर ब्याज की दरें बढा देंगे और साथ ही बचत पर भी ब्याज की दरें बढ़ा देंगे। (जैसा की अभी हाल ही में दो बार हुआ।) इससे मंहगाई पर तो तत्कालीन असर हो जाता है मगर दीर्ध अवधी में मंहगे ऋणों के कारण उद्योगों के विस्तार पर असर पड़ता है जो कि अर्थव्यवस्था की तेजी को धीमा कर देता है।

इसके अलावा विदेशों से अप्रवासियों तथा विदेशी संस्थानों द्वारा तेजी से बढ़ते निवेश का प्रबंधन भी रिजर्व बैंक को करना होता है क्योंकि अर्थव्यवस्था की तेजी के कारण इन विदेशी निवेशों में बेतहाशा वृद्धी हुई है। विदेशी निवेश अपने साथ विदेशी मुद्रा ले कर आते हैं। रिजर्व बैंक विदेशी मुद्रा को रुपयों के बदले खरीदता है जिससे और अधिक मुद्रा का विस्तार होता है। पिछले दो बार में CRR की बढ़ोत्तरी से जो मुद्रा के विस्तार में कमी की गयी उसका असर विदेशों से आते निवेश तथा ऋणों ने समाप्त कर दिया। जहां 0.5% की CRR दर में वृद्धी ने अर्थव्यवस्था से14000 करोड़ रु की मुद्रा को कम किया वहीं इस वर्ष के पहले चार महीनों में अर्थव्यवस्था में लगभग 46000 करोड़ रुपये विदेशी मुद्रा के रूप में आ गये। इसका असर यह हुआ कि रिजर्व बैंक ने विदेशी मुद्रा की खरीद में कमी कर दी जिससे रुपया मजबूत होने लगा। रुपये की कम समय में इतनी मजबूती निर्यातकों के लिये तो मारक होती ही है, सस्ते आयात घरेलू उद्योगों पर भी बुरा असर डालते हैं।

आप यह जान कर हैरान न हों कि अब अर्थशास्त्र के ज्ञाता भी इस अर्थव्यवस्था की इस तेजी से डरने लगे हैं। जहां चीन कई वर्षों से लगातार 10% से अधिक की विकास दर होने पर भी मुद्रास्फीती को 2-2.5% के आसपास रखने में कामयाब रहा है वहीं खराब मुद्रा प्रबंधन के कारण हम 9.4% के विकास पर ही हांफने लगे हैं।

भारतीय अर्थव्यवस्था और विकास पर अन्य लेख
यह भी रंग विकास के
आम आदमी के साथ….?
विकास के यह रंग
वर्ष 2007 होगा भारत का
यह भी है हमारा भारत
15 वर्षों के आर्थिक सुधार- कितने मोबाईल
हट सकती है करों में छूट
जहां आम आदमी देते हैं टैक्स और अमीर बच कर निकलते हैं

बजट अपडेट लाईव Budget live update

बजट पेश करने का आज से खराब दिन पी चिदंबरम जी के लिये कोई नहीं हो सकता था। दुनिया भर के शेयर बाजार आज सुबह से धड़ा धड़ गिर रहे हैं। लग रहा है कि आज हमारे शेयर बाजारों पर भी खून बहेगा। :(
एक दिन पहले कांग्रेस उत्तराखंड और पंजाब में हार गयी। मंहगाई से लोग त्रस्त हैं। वैसे जब सारे टी वी चैनल और समाचार पत्र कांग्रेस की हार के लिये मंहगाई को जिम्मेदार बता रहे हैं, शहरों में कांग्रेस की हार के पीछे आरक्षण और अर्जुन सिंह कितने जिम्मेदार हैं, यह भी सोचने की बात होगी।

आपको हिंदी में बजट के मुख्य बिंदू लगातार यहां बताये जायेंगे। उम्मीद है कि वित्तमंत्री जी महंगाई को काबू करने के उपाय करेंगे और कृषि क्षेत्र को बढ़ावा दिये जाने की कोशिश की जायेगी। यदि आपको इस विषय में रुचि है तो इस पेज को रिफ्रेश करते रहें।
सेंसेक्स ४३३ प्वाईट नीचे खुला
निफ्टी १५७ प्वाईंट नीचे खुला
गैहूं और चावल की फ्यूचर ट्रेडिंग पर प्रतिबंध लगा।
(मगर अफसोस दो राज्यों को खोने के बाद। लगता है दो राज्य खोने के बाद सरकार बदहवासी में कदम उठा रही है)
बजट प्रावधान
शिक्षा बजट में ३५ % वृद्धी
स्वास्थ्य के बजट में २२% वृद्धी
आयुर्वेद पर खास ध्यान (आयुर्वेद FMCG के लिये अच्छा)
कृषि को खास ध्यान
अच्छे बीजों के लिये निजी कंपनियों से सहयोग लिया जायेगा
खाद सब्सिडी सीधे किसानों को दिये जाने का तरीका खोजा जायेगा। सिंचाई पर खास ध्यान।
गरीब ग्रामीन भूमीहीनों के लिये आम आदमी जीवन बीमा योजना, आधा प्रीमियम केंद्र सरकार देगी, बाकी आधा राज्य सरकारें।
अनओर्गनाईज सेक्टर के लिये सामाजिक सुरक्षा योजना
शेयर बाजार में ट्रेडिंग के लिये सभी को PAN जरूरी
रक्षा पर 96000 करोड़ की वृद्धी
म्यूचल फंड के जरिये आम आदमी विदेशों में निवेश कर सकेंगे ( कीमतों को कम करने में सहायक)
मुंबई को विश्व स्तर की फाईनेंशल सिटी बनाया जायेगा
विकलांगों को एक लाख सरकारी नौकरियां
दिल्ली कामेनवेल्थ गेम के लिये ५०० करोड़
बाजार कुछ संभले
सेंसेक्स अब २५० प्वाईंट नीचे (१२.१० बजे)
टैक्स क्लेक्शन २७ % बढ़ा
कस्टम (गैर कृषी चीजों के लिये)ड्यूटी पीक रेट १२.५ से घटा कर १० % ( कीमतों को कम करने में सहायक)
सर्विस टैक्स रेट में बदलाव नहीं
कुत्ते बिल्लियों के खाने का सामान सस्ता (इन्सानो का भी ध्यान करें मंत्री जी) :(
पोलियेस्टर, खाने का तेल, सिंचाई उपकरण और पाईप्स सस्ते
सर्विस टैक्स में और सेवाएं शामिल

निजी आयकर में कुछ राहत
आयकर में छूट १०००० रु से बढ़ी (आम कर देने वालों को एक हजार रु की बचत)
जम्मू कश्मीर में उद्योगों को और पांच वर्ष तक करों में छूट
कार्पोरेट टैक्स रेट में बदलाव नहीं
एजुकेशन सेस २% से बढ़ कर ३% हुआ
डिविडेंड डिस्ट्रिब्यूशन टैक्स बढ़ कर १५%
IT कंपनियों पर MAT लगा
IT कंपनियों में ESOP पर FBT लगा
एक करोड तक के लाभ कमाने वाले कार्पोरेट्स पर सरचार्ज नहीं
(बजट फुस्स लग रहा है
बाजार फिर फिसले)
ना आम आदमी को कुछ मिला न ही खास आदमी को
बाजार लुड़के
आधा घंटा तक कृषि पर बोले पर कोई बड़ी घोषणा नहीं की। कृषि का योगदान जीडीपी में घट रहा है मगर इसे बढ़ाने के लिये कुछ नहीं क्या है।
कंपनियों पर टैक्स का बोझ बढ़ेगा। कुछ रिफार्म्स नहीं किये। ज्यादा ले लिया पर दिया कुछ भी नहीं।

मेरी राय

यह एक दिशा हीन बजट है। उम्मीद थी कि कीमतें कम करने तथा कृषि के विकास के लिये कुछ क्रांतिकारी कदम उठाये जायेंगे मगर इस दिशा में साधारण कदम भी नहीं उठाये गये। एक मौका गंवा दिया। वित्त मंत्री दबाव में लग रहे हैं। दस साल पहले वाले चिदंबरम का जलवा नहीं दिखा सके।
मुझे कभी कभी लगता है कि मैडम जी, प्र मं जी, वि मं जी तथा वाम पक्ष में जबर्दस्त संवाद हीनता है। ना कोई विजन है और न ही कोई दिशा। :(

जहां आम आदमी देते हैं टैक्स और अमीर बच कर निकलते हैं

हट सकती है करों में छूट – २हमारे देश में यही होता है कि आम आदमी को तो टैक्स देने पड़ते है और अमीर कई तरह की छूटों का लाभ लेकर टैक्स देने से बच निकलते हैं।

सर्विस टैक्स एक ऐसा टैक्स है जो कि सरकार ने लगभग 95 प्रकार की सेवाओं पर लगाया हुआ है। इनमें कई सेवाएं जैसे कि मोबाईल तथा फिक्सड फोन, कुरियर, तार भेजना, केबल, स्कूटर का बीमा, रेल टिकट एजेंट, ड्राईक्लीनिंग जैसी अन्य कई सेवाएं ऐसी हैं जो कि आम आदमी के प्रयोग की हैं। यदि आप माह में पांच हजार रुपये इन 95 सेवाओं पर खर्चते हैं तो 12.24% की दर से 612 रु हर माह सरकार को सर्विस टैक्स देते हैं। यानि साल में 7344 रु। हैरानी की बात यह है कि जहां कम्पनियों और अमीरों पर लगने वाले टैक्स घट रहे हैं, सर्विस टैक्स जो कि 1994 में केवल 5% की दर से शुरू किया गया था, बढ़ कर 12.24% हो गया। यही नहीं लगातार कर योग्य सेवाओं का दायरा भी बढता जा रहा है। अब तो शायद ही कोई सेवा बची हो जो कि करों के दायरे में न आई हो।

जैसा कि मैंने अपने पिछले लेख हट सकती है करों में छूट में लिखा था 2006-07 में सरकार को विभिन्न छूटों से राजस्व हानि हुई 1,58,661 करोड़ रुपये। इसमें से बहुत बड़ा भाग बचाया बड़ी कम्पनियों ने। निजी करदाताओं को दी जाने वाली छूट से हुई हानी केवल 11,695 करोड़ रुपये ही थी।

निजी करदाताओं को जो छूट मिलती हैं उनमें शामिल हैं गृह ऋण पर दी जाने वाली छूट, विभिन्न बचत योजनाओं में निवेश पर छूट तथा कृषि आय पर छूट।

कृषि आय पर दी जाने वाली छूट को शायद ही सरकार छेड़ पाये। आने वाले राज्यों के चुनावों को देखते हुए तो यह और भी कठिन लगता है। यह एक ऐसा विषय है जिस पर अलग से एक लेख लिखा जा सकता है, वैसे साथी चिट्ठाकर इस बारे में क्या सोचते हैं यह जानना रुचिकर होगा।

हाउसिंग लोन पर करों में छूट देने से हाउसिंग को बढ़ावा मिलता है। इससे अर्थव्यव्स्था के मूल घटकों जैसे कि सीमेंट तथा स्टील क्षेत्रों के साथ साथ बैंकिंग को भी बढ़ावा मिलता है। कुछ हजार करोड़ बचाने के लिये हाउसिंग बूम को रोकने का काम सरकार कर पाती है या नहीं आने वाले बजट में यह देखना रुचिकर होगा।

छोटे करदाताओं को बचत योजनाओं में निवेश पर दी जाने वाली छूट नौकरीपेशा लोगों के लिये परेशानी का कारण हो सकती है। हो सकता है कि अभी निवेश करने पर मिलने वाली छूट जारी रहे मगर इन निवेशों में मैच्योरिटी पर मिलने वाली रकम पर टैक्स लगना शुरू हो जाये।

यानि लगता है कि कुल मिला सरकार को अधिक से अधिक टैक्स जुटाने के लिये आम आदमी ही मिलेगा तथा बड़े लोग एवम कम्पनियां बचते ही रहेंगे।

दुनिया में कई देश हैं जहां टैक्स या तो हैं ही नहीं अथवा इतने कम हैं कि इन देशों को टैक्स हैवन कहा जाता है। इनके बारे में अंग्रेजी विकीपीडिया पर यहां पढ़ें।

भारतीय अर्थव्यवस्था और विकास पर अन्य लेख
यह भी रंग विकास के
आम आदमी के साथ….?
विकास के यह रंग
वर्ष 2007 होगा भारत का
यह भी है हमारा भारत
15 वर्षों के आर्थिक सुधार- कितने मोबाईल
हट सकती है करों में छूट

Follow

Get every new post delivered to your Inbox.