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Keyword: ‘शिव’

शिव कुमार बटालवी के कुछ गीत

शिव कुमार बटलवी के बारे में मैंने पहले भी लिखा था और उनके कुछ गीत प्रस्तुत किये थे।

आज उनके जन्मदिन पर फिर से उनके बारे में बता रहा हूं और कुछ और गीत पेश कर रहा हूं।

बिरह का सुलतान – शिव कुमार बटालवी (ਸ਼ਿਵ ਕੁਮਾਰ ਬਟਾਲਵੀ)

शिव कुमार बटालवी पंजाबी के ऐसे आधुनिक कवि हैं जिनके गीतों में पंजाब के लोकगीतों का आनंद भी हैं।
शिव का जन्म 23 जुलाई 1936 को शकरगढ़, पंजाब (अब पाकिस्तान में) में हुआ था। बंटवारे के बाद उनका परिवार बटाला में आ गया। ढेरों गीत और कवितायें लिखने वाले शिव कुमार बटालवी को 1965 में अपने काव्य नाटक “लूणा ” के लिये साहित्य अकादमी अवार्ड मिला। शिव के गीतों में प्यार है, दर्द है, सब से बड़ी बात है कि उन्होंने पंजाबी को अपने गीतों से समृद्ध किया। उन्हे बिरह का सुल्तान कहा जाता है। पंजाबी अपने इस कवि से बहुत प्यार करते हैं। पंजाब में कवितायें लोक गीत बन जाती है और कवि पढ़े चाहे जायें या नहीं मगर सुने बहुत जाते हैं। जैसे वारिस शाह की ‘हीर’ गायी और सुनी जाती है। शिव के गीत भी पंजाब में बहुत लोकप्रिय है, इस का अंदाज इस बात से ही लगाया जा सकता है कि उनके गीतों को लगभग सभी पंजाबी गायकों ने तो गाया ही, महेन्द्र कपूर और नुसरत फतह अली खान साहब ने भी गाया। जगजीत सिंह तथा चित्रा सिंह द्वारा गाये शिव के गीतों की एलबम मेरी सबसे प्रिय एलबम है। (आप इनके गाये शिव के गीतों को सुनने के लिये इन लिंकों पर क्लिक कर सकते हैं)

मिर्चां दे पत्तर

पुनियां दे चन्न नूं कोइ मस्या
कीकण अरघ चड़ाये वे
कद कोई डाची सागर खातिर
मारू थल छड जाये वे

करमां दी मेंहदी दा सजना
रंग कीवें दस्स चड़दा वे
जे किस्मत मिर्चां दे पत्तर
पीठ तली ते लाये वे,

गम दा मोतिया उत्तर आया
सिदक मेरी दे नैनीं वे
प्रीत नगर दा औखा पैंदा
जिंदड़ी किंज मुकाये वे

किकरां दे फुल्लां दी अड़िया
कौन करेंदा राखी वे
कद्द कोइ माली मल्लियां उत्तों
हरियल आन्न छुड़ाये वे

तड़प तड़प के मर गयी अड़िया
मेल तेरे दी हसरत वे
ऐसे इशक दे जुल्मी राजे
बिरहों बाण चलाये वे

चुग्ग चुग्ग रोड़ गली तेरी दे
घुंघणियां वांग चब लये वे
कट्ठे कर कर के मैं तीले
बुक्कल विच दुखाये वे

इक चुल्ली वी पी न सकी
प्यार दे नितरे पानी वे
व्योंध्या सार पये विच पूरे
जां मैं होंठ छुहाये वे.

इश्तेहार

इक कुड़ी जिंदा नां महोब्बत
गुम है गुम है गुम है
साद मुरादी सोहणी फब्बत
गुम है गुम है गुम है

सूरत उसदी परियां वरगी
सीरत दी ओ मरियम लगदी
हंसदी है तां फुल्ल झड़दे ने
तुरदी है तां गजल है लगदी
लम्म सलम्मी सरू दे कद्द दी
उमर अजे है मर के अग्ग दी
पर नैनां दी गल्ल समझदी

गुमयां जनम जनम हण होये
पर लगदा ज्यों कल दी गल है
यूं लगदा ज्यों अज्ज दी गल्ल है
यूं लगदा ज्यूं हुण दी गल्ल है

हुणे तां मेरे कौल खड़ी सी
हुणे तां मेरे कौल नहीं है
एह की छल है एह केही भटकन
सोच मेरी हैरान बड़ी है
नजर मेरी हर आंदे जांदे
चेहरे दा रंग फोल रही है
ओस कुड़ी नूं टोल रही है

ओस कुड़ी नूं मेरी सौं है
ओस कुड़ी नूं अपनी सौं है
ओस कुड़ी नूं सब दी सौं है
ओस कुड़ी नूं जग दी सौं है
जे कित्थे पड़दी सुनदी होवे
ज्यूंदी या ओह मर रही होवे
इक वारी आके मिल जावे
वफा मेरी नूं दाग ना लावे
नहीं तां मैथों जिया ना जांदा
गीत कोइ लिखया ना जांदा

इक कुड़ी जिंदा नां महोब्बत
गुम है गुम है गुम है
साद मुरादी सोहणी फब्बत
गुम है गुम है गुम है

रुख

कुज रुख मैनूं पुत्त लगदे ने
कुज रुख लगदे मांवां
कुज रुख नूंहां धीयां लगदे
कुज रुख वांग भरांवां
कुज रुख मेरे बाबे वक्कण
पत्तर तांवां तांवां
कुज रुख मेरी दादी वरगे
चूरी पावन कांवां
कुज रुख यांरा वरगे लगदे
चुम्मां ते गल्ल लावां
इक मेरी महबूबा वक्कण
मिट्ठा अते दुखांवां
कुज रुख मेरा दिल करदा वे
मोडे चक्क खिडावां
कुज रुख मेरा दिल करदा वे
चुम्मां ते मर जांवा
कुज रुख जद वी रल के झुम्मण
तेज वगन जद हवांवा
सावी बोली सब रुखां दी
दिल करदा लिख जांवां
मेरा वी एह दिल करदा है
रुख दी जूणे आवां
जे तुसां मेरा गीत है सुनना
मैं रुखां विच गांवा
रुख तां मेरी मां वरगे ने
ज्यों रुखां दियां छांवां.

यूं तो मैं इतना सक्षम नहीं कि इन खूबसूरत गीतों के भावार्थ लिख पाऊं फिर भी अनूपजी और समीर जी के कहने पर कोशिश कर रहा हूं।

पहला गीत विरह का गीत है।

शुरू की पंक्तियों के भाव हैं

किस्मत की मेंहदी का दोस्त रंग बता कैसे चढ़े

गर किस्मत ही मिर्ची के पत्ते पीस हथेली पर लगाये रे

दूसरी नज्म एक इश्तहार के रूप में है

एक लड़की जिसका नाम मोहब्बत

गुम है

सूरत उसकी परियों जैसी

सीरत उसकी मरियम जैसी

हंसती है तो फूल झड़ते हैं

चलती है तो गजल है लगती

छोटी उम्र है पर आंखों की बात समझती है

उसे गुम हुए कई जनम बीत चुके

पर लगता है ज्यों अभी की बात है

उस लड़की को मेरी सौगंध है

अगर कहीं पढ़ या सुन रही हो

एक बार आ कर मिल जाये

नहीं तो मैं अब जी नहीं सकता

गीत कोई भी लिख नहीं सकता

तीसरा गीत है रुख यानी वृक्ष

कुछ पेड़ मुझे बच्चों जैसे लगते हैं

कुछ माओं जैसे

कुछ भाइयों जैसे

कुछ बेटियों बहुओं जैसे

कुछ दोस्तों जैसे

दिल करे गले लगा लूं

कुछ महबूबा जैसे

मी्ठे और कभी खट्टे

कुछ को दिल करे कंधे लगा कर खिलाऊं

सब पेड़ों की एक ही भाषा

दिल करे उसी भाषा में लिख जाऊं

कभी कभी मेरा दिल करता है

पेड़ का जनम ले कर आऊं

यदि आपको मेरा गीत सुनना है

तो मैं पेड़ों के बीच हॊ गाऊं

पेड़ मेरी मां जैसे हैं

मांएं जैसे ठंडी छायाएं।

 

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“बिरह” का सुलतान – शिव कुमार बटालवी

 


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“बिरह” का सुलतान – शिव कुमार बटालवी

नवम्बर 25, 2006 9 comments

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बिरह का सुलतान – शिव कुमार बटालवी (ਸ਼ਿਵ ਕੁਮਾਰ ਬਟਾਲਵੀ)शिव कुमार बटालवी पंजाबी के ऐसे आधुनिक कवि हैं जिनके गीतों में पंजाब के लोकगीतों का आनंद भी हैं।
शिव का जन्म 23 जुलाई 1936 को शकरगढ़, पंजाब (अब पाकिस्तान में) में हुआ था। बंटवारे के बाद उनका परिवार बटाला में आ गया। ढेरों गीत और कवितायें लिखने वाले शिव कुमार बटालवी को 1965 में अपने काव्य नाटक “लूणा ” के लिये साहित्य अकादमी अवार्ड मिला। शिव के गीतों में प्यार है, दर्द है, सब से बड़ी बात है कि उन्होंने पंजाबी को अपने गीतों से समृद्ध किया। उन्हे बिरह का सुल्तान कहा जाता है। पंजाबी अपने इस कवि से बहुत प्यार करते हैं। पंजाब में कवितायें लोक गीत बन जाती है और कवि पढ़े चाहे जायें या नहीं मगर सुने बहुत जाते हैं। जैसे वारिस शाह की ‘हीर’ गायी और सुनी जाती है। शिव के गीत भी पंजाब में बहुत लोकप्रिय है, इस का अंदाज इस बात से ही लगाया जा सकता है कि उनके गीतों को लगभग सभी पंजाबी गायकों ने तो गाया ही, महेन्द्र कपूर और नुसरत फतह अली खान साहब ने भी गाया। जगजीत सिंह तथा चित्रा सिंह द्वारा गाये शिव के गीतों की एलबम मेरी सबसे प्रिय एलबम है। (आप इनके गाये शिव के गीतों को सुनने के लिये इन लिंकों पर क्लिक कर सकते हैं)

असां ते जोबण रुते मरना
टुर जाणा असां भरे भराये,

एह मेरा गीत किसे ना गाणा
एह मेरा गीत मैं आपे गा के
भलके ही मर जाणा.

तथा

यारणया रब करके मैंणूं
पैण बिरहों दे कीड़े वे,
नैंना दे दो संदले बूहे
जाण सदा लई भीड़े वे.

लिखने वाले शिव का देहान्त मात्र 36 वर्ष की उम्र में मई 7,1973 को हो गया।

शिव कुमार बटालवी के कुछ गीत यहां दे रहा हूं, मुझ में इतनी क्षमता नहीं कि इनका हिंदी अनुवाद कर सकूं(कुछ शब्दों के अर्थ अंत में देने की कोशिश की है), मगर देवनागरी में टाईप किया है उन लोगों के लिये जो पंजाबी को समझ सकते हैं मगर गुरमुखी में पढ़ नहीं सकते।

मैं इक शिकरा यार बनाया.

माये नी माये
मैं इक शिकरा यार बनाया.
ओदे सिर ते कलगी
ओदे पैरीं झांजर
ते ओ चोग चुगेंदा आया.

इक ओदे रूप दी धुप तिखेरी
दुजा महकां दा तिरहाया
तीजा ओदा रंग गुलाबी
किसे गोरी मां दा जाया.

इश्के दा इक पलंग नवारी,
असां चानन्नियां विच डाया
तन दी चादर हो गई मैली
उस पैर जां पलंगे पाया.

दुखण मेरे नैनां दे कोये
विच हाड़ हंजुआं दा आईया
सारी रात गई विच सोचां
उस ए कि जुल्म कमाया.

सुबह सवेरे लै नी वटणा
असां मल मल ओस नव्हाया
देही दे विचों निकलण चींगां
ते साडा हाथ गया कुम्हलाया.

चूरी कुट्टां तां ओ खांदा नाही
ओन्हुं दिल दा मांस खवाया
इक उडारी ऐसी मारी
ओ मुड़ वतनी ना आया.

ओ माये नीं
मैं इक शिकरा यार बनाया
ओदे सिर ते कलगी
ओदे पैरीं झांजर
ते ओ चोग चुगेंदा आया.

उधारा गीत

सांनूं प्रभ जी,
इक अद गीत उधारा होर देयो.
साडी बुझदी जांदी आग्ग,
अंगारा होर देयो.

मैं निक्की उम्रे
सारा दर्द हंडा बैठा,
साडी जोबन रुत लई,
दर्द कुंआरा होर देयो.

उम्रां दे सरवर

उम्रां दे सरवर
साहां दे पाणी
गीता वे चुंज भरीं.

भलके ना रहने
पीड़ा दे चानन
हावां दे हंस सरीं
गीता वे चुंज भरीं.

गीता वे उम्रां दे सरवर छलिये
पल्छिन भर सुक जांदे
साहवां दे पानी पी लै वे अड़िया
अनचाहियां फिट जांदे
भलके न सानूं दईं वे उलमड़ा
भलके न रोस करीं
गीता वे चुंज भरीं.

हावां दे हंस
सुनींदे वे लोभी
दिल मरदा तां गांदे
इह बिरहों रुत हंजू चुकदे
चुकदे ते उड जांदे
ऐसे उडदे मार उडारी
मुड़ ना आण घरीं
गीता वे चुंज भरीं.

गीता वे चुंज भरें तां मैं तेरी
सोने चुंज मढ़ावां
मैं चंदरी तेरी बरदी थींवां
नाल थीए परछांवां
हाड़ाई वे ना तूं तिरहाया
मेरे वांग मरीं
गीता वे चुंज भरीं.

माये नी माये

माये नी माये
मेरे गीतां दे नैणा विच
बिरहों दी रड़क पवे
अद्दी अद्दी राती उठ
रोण मोये मितरां नूं
माये सानूं नींद न पवे.

भें भें सुगंधियां च
बणा फेहे चानन्नी दे
तांवी साडी पीड़ न सवे
कोसे कोसे साहां दी में
करां जे टकोर माये
सगों साहणु खाण नूं पवे.

आपे नि मैं बालड़ी
मैं हाले आप मत्तां जोगी
मात्त केड़ा एस नूं दवे
आख सूं नि माये इहनूं
रोवे बुल चिथ के नी
जग किते सुन न लवे.

आख माय्रे अद्दी अद्दी
रातीं मोये मित्रां दे
उच्ची उच्ची नां ना लवे
मते साडे मोयां पिछे
जग ए सड़िकरा नी
गीतां नुं वी चंदरा कवे.

की पुछदे ओ हाल

की पुछदे ओ हाल फकीरां दा
साडा नदियों विछड़े नीरां दा
साडा हंज दी जूने आयां दा
साडा दिल जलयां दिल्गीरां दा.

साणूं लखां दा तन लभ गया
पर इक दा मन वी न मिलया
क्या लिखया किसे मुकद्दर सी
हथां दियां चार लकीरां दा.

तकदीर तां अपनी सौंकण सी
तदबीरां साथों ना होईयां
ना झंग छुटिया, न काण पाटे
झुंड लांघ गिया इंज हीरां दा.

मेरे गीत वी लोक सुणींदे ने
नाले काफिर आख सदींदे ने
मैं दर्द नूं काबा कह बैठा
रब नां रख बैठा पीड़ां दा.

शिकरा = बाज
तिखेरी = तीखी
तिरहाया = सराबोर
अड़िया = दोस्त
जाया = जन्मा
हाड़ हंजुआं दा = आंसुंओं की बाढ़
चींगां = चिंगारियां
चूरी = घी और रोटी से बनने वाला
हंडा = व्यतीत, खर्च
सरवर = सरोवर
साहां = सांसें
चुंज = चोंच
भलके = सुबह सुबह
हावां = आहें
उलमड़ा = उलाहना
हंजू = आंसू
घरीं = घर
चंदरी = तुच्छ
बरदी थींवा = नौकर बन जाऊं
नाल थीए परछांवां = परछाई बन जाऊं
तिरहाया = प्यासा
वांग = तरह
भें भें = भिगो भिगो कर
बणा फेहे = बांधूं फाहे

चानन्नी = चांदनी

तांवी = तो भी
कोसे कोसे साहां = गर्म सांसे
बालड़ी = बालिका
मत्तां = समझदारी
रोवे बुल चिथ के = होंठ दबा कर रोये
सड़िकरा = जलन करने वाला
हंज = आंसू
सौंकण = सौतन

ਮੈਂ ਇਕ ਸ਼ਿਕਰਾ ਯਾਰ ਬਨਾਯਾ.

ਮਾਯੇ ਨੀ ਮਾਯੇ
ਮੈਂ ਇਕ ਸ਼ਿਕਰਾ ਯਾਰ ਬਨਾਯਾ
ਓਦੇ ਸਿਰ ਤੇ ਕਲਗੀ
ਓਦੇ ਪੈਰੀਂ ਝਾਂਜਰ
ਤੇ ਓ ਚੋਗ ਚੁਗੇਂਦਾ ਆਯਾ.
ਇਕ ਓਦੇ ਰੂਪ ਦੀ ਧੁਪ ਤਿਖੇਰੀ
ਦੁਜਾ ਮਹਕਾਂ ਦਾ ਤਿਰਹਾਯਾ
ਤੀਜਾ ਓਦਾ ਰਂਗ ਗੁਲਾਬੀ
ਕਿਸੇ ਗੋਰੀ ਮਾਂ ਦਾ ਜਾਯਾ.
ਇਸ਼੍ਕੇ ਦਾ ਇਕ ਪਲਂਗ ਨਵਾਰੀ,
ਅਸਾਂ ਚਾਨੰਨਿਯਾਂ ਵਿਚ ਡਾਯਾ
ਤਨ ਦੀ ਚਾਦਰ ਹੋ ਗਈ ਮੈਲੀ
ਉਸ ਪੈਰ ਜਾਂ ਪਲਂਗੇ ਪਾਯਾ.
ਦੁਖਣ ਮੇਰੇ ਨੈਨਾਂ ਦੇ ਕੋਯੇ
ਵਿਚ ਹਾਡ਼੍ਅ ਹਂਜੁਆਂ ਦਾ ਆਈਯਾ
ਸਾਰੀ ਰਾਤ ਗਈ ਵਿਚ ਸੋਚਾਂ
ਉਸ ਏ ਕਿ ਜੁਲ੍ਮ ਕਮਾਯਾ.
ਸੁਬਹ ਸਵੇਰੇ ਲੈ ਨੀ ਵਟਣਾ
ਅਸਾਂ ਮਲ ਮਲ ਓਸ ਨਵ੍ਹਾਯਾ
ਦੇਹੀ ਦੇ ਵਿਚੋਂ ਨਿਕਲਣ ਚੀਂਗਾਂ
ਤੇ ਸਾਡਾ ਹਾਥ ਗਯਾ ਕੁਮ੍ਹਲਾਯਾ.
ਚੂਰੀ ਕੁੱਟਾਂ ਤਾਂ ਓ ਖਾਂਦਾ ਨਾਹੀ
ਓਨ੍ਹੁਂ ਦਿਲ ਦਾ ਮਾਂਸ ਖਵਾਯਾ
ਇਕ ਉਡਾਰੀ ਐਸੀ ਮਾਰੀ
ਓ ਮੁਡ਼੍ਅ ਵਤਨੀ ਨਾ ਆਯਾ.
ਓ ਮਾਯੇ ਨੀਂ
ਮੈਂ ਇਕ ਸ਼ਿਕਰਾ ਯਾਰ ਬਨਾਯਾ
ਓਦੇ ਸਿਰ ਤੇ ਕਲਗੀ
ਓਦੇ ਪੈਰੀਂ ਝਾਂਜਰ
ਤੇ ਓ ਚੋਗ ਚੁਗੇਂਦਾ ਆਯਾ.


ਉਧਾਰਾ ਗੀਤ

ਸਾਂਨੂਂ ਪ੍ਰਭ ਜੀ,
ਇਕ ਅਦ ਗੀਤ ਅਧਾਰਾ ਹੋਰ ਦੇਯੋ.
ਸਾਡੀ ਬੁਝਦੀ ਜਾਂਦੀ ਆੱਗ,
ਅਂਗਾਰਾ ਹੋਰ ਦੇਯੋ.
ਮੈਂ ਨਿੱਕੀ ਉਮ੍ਰੇ
ਸਾਰਾ ਦਰ੍ਦ ਹਂਡਾ ਬੈਠਾ,
ਸਾਡੀ ਜੋਬਨ ਰੁਤ ਲਈ,
ਦਰ੍ਦ ਕੁਂਆਰਾ ਹੋਰ ਦੇਯੋ.

ਉਮ੍ਰਾਂ ਦੇ ਸਰਵਰ

ਉਮ੍ਰਾਂ ਦੇ ਸਰਵਰ
ਸਾਹਾਂ ਦੇ ਪਾਣੀ
ਗੀਤਾ ਵੇ ਚੁਂਜ ਭਰੀਂ.
ਭਲਕੇ ਨਾ ਰਹਨੇ
ਪੀਡ਼੍ਆ ਦੇ ਚਾਨਨ
ਹਾਵਾਂ ਦੇ ਹਂਸ ਸਰੀਂ
ਗੀਤਾ ਵੇ ਚੁਂਜ ਭਰੀਂ.
ਗੀਤਾ ਵੇ ਉਮ੍ਰਾਂ ਦੇ ਸਰਵਰ ਛਲਿਯੇ
ਪਲ੍ਛਿਨ ਭਰ ਸੁਕ ਜਾਂਦੇ
ਸਾਹਵਾਂ ਦੇ ਪਾਨੀ ਪੀ ਲੈ ਵੇ ਅਡ਼੍ਇਯਾ
ਅਨਚਾਹਿਯਾਂ ਫਿਟ ਜਾਂਦੇ
ਭਲਕੇ ਨ ਸਾਨੂਂ ਦਈਂ ਵੇ ਉਲਮਡਾ
ਭਲਕੇ ਨ ਰੋਸ ਕਰੀਂ
ਗੀਤਾ ਵੇ ਚੁਂਜ ਭਰੀਂ.
ਹਾਵਾਂ ਦੇ ਹਂਸ
ਸੁਨੀਂਦੇ ਵੇ ਲੋਭੀ
ਦਿਲ ਮਰਦਾ ਤਾਂ ਗਾਂਦੇ
ਇਹ ਬਿਰਹੋਂ ਰੁਤ ਹਂਜੂ ਚੁਕਦੇ
ਚੁਕਦੇ ਤੇ ਉਡ ਜਾਂਦੇ
ਐਸੇ ਉਡਦੇ ਮਾਰ ਉਡਾਰੀ
ਮੁਡ਼੍ਅ ਨਾ ਆਣ ਘਰੀਂ
ਗੀਤਾ ਵੇ ਚੁਂਜ ਭਰੀਂ.
ਗੀਤਾ ਵੇ ਚੁਂਜ ਭਰੇਂ ਤਾਂ ਮੈਂ ਤੇਰੀ
ਸੋਨੇ ਚੁਂਜ ਮਢ਼੍ਆਵਾਂ
ਮੈਂ ਚਂਦਰੀ ਤੇਰੀ ਬਰਦੀ ਥੀਂਵਾਂ
ਨਾਲ ਥੀਏ ਪਰਛਾਂਵਾਂ
ਹਾਡ਼੍ਆਈ ਵੇ ਨਾ ਤੂਂ ਤਿਰਹਾਯਾ
ਮੇਰੇ ਵਾਂਗ ਮਰੀਂ
ਗੀਤਾ ਵੇ ਚੁਂਜ ਭਰੀਂ.

ਮਾਯੇ ਨੀ ਮਾਯੇ

ਮਾਯੇ ਨੀ ਮਾਯੇ
ਮੇਰੇ ਗੀਤਾਂ ਦੇ ਨੈਣਾ ਵਿਚ
ਬਿਰਹੋਂ ਦੀ ਰਡ਼੍ਅਕ ਪਵੇ
ਅੱਦੀ ਅੱਦੀ ਰਾਤੀ ਉਠ
ਰੋਣ ਮੋਯੇ ਮਿਤਰਾਂ ਨੂਂ
ਮਾਯੇ ਸਾਨੂਂ ਨੀਂਦ ਨ ਪਵੇ.
ਭੇਂ ਭੇਂ ਸੁਗਂਧਿਯਾਂ ਚ
ਬਣਾ ਫੇਹੇ ਚਾਨੰਨੀ ਦੇ
ਤਾਂਵੀ ਸਾਡੀ ਪੀਡ਼੍ਅ ਨ ਸਵੇ
ਕੋਸੇ ਕੋਸੇ ਸਾਹਾਂ ਦੀ ਮੇਂ
ਕਰਾਂ ਜੇ ਟਕੋਰ ਮਾਯੇ
ਸਗੋਂ ਸਾਹਣੁ ਖਾਣ ਨੂਂ ਪਵੇ.
ਆਪੇ ਨਿ ਮੈਂ ਬਾਲਡ਼੍ਈ
ਮੈਂ ਹਾਲੇ ਆਪ ਮੱਤਾਂ ਜੋਗੀ
ਮਾੱਤ ਕੇਡ਼੍ਆ ਏਸ ਨੂਂ ਦਵੇ
ਆਖ ਸੂਂ ਨਿ ਮਾਯੇ ਇਹਨੂਂ
ਰੋਵੇ ਬੁਲ ਚਿਥ ਕੇ ਨੀ
ਜਗ ਕਿਤੇ ਸੁਨ ਨ ਲਵੇ.
ਆਖ ਮਾਯ੍ਰੇ ਅੱਦੀ ਅੱਦੀ
ਰਾਤੀਂ ਮੋਯੇ ਮਿਤ੍ਰਾਂ ਦੇ
ਉੱਚੀ ਉੱਚੀ ਨਾਂ ਨਾ ਲਵੇ
ਮਤੇ ਸਾਡੇ ਮੋਯਾਂ ਪਿਛੇ
ਜਗ ਏ ਸਡ਼੍ਇਕਰਾ ਨੀ
ਗੀਤਾਂ ਨੁਂ ਵੀ ਚਂਦਰਾ ਕਵੇ.

ਕੀ ਪੁਛਦੇ ਓ ਹਾਲ

ਕੀ ਪੁਛਦੇ ਓ ਹਾਲ ਫਕੀਰਾਂ ਦਾ
ਸਾਡਾ ਨਦਿਯੋਂ ਵਿਛਡ਼੍ਏ ਨੀਰਾਂ ਦਾ
ਸਾਡਾ ਹਂਜ ਦੀ ਜੂਨੇ ਆਯਾਂ ਦਾ
ਸਾਡਾ ਦਿਲ ਜਲਯਾਂ ਦਿਲ੍ਗੀਰਾਂ ਦਾ.
ਸਾਣੂਂ ਲਖਾਂ ਦਾ ਤਨ ਲਭ ਗਯਾ
ਪਰ ਇਕ ਦਾ ਮਨ ਵੀ ਨ ਮਿਲਯਾ
ਕ੍ਯਾ ਲਿਖਯਾ ਕਿਸੇ ਮੁਕੱਦਰ ਸੀ
ਹਥਾਂ ਦਿਯਾਂ ਚਾਰ ਲਕੀਰਾਂ ਦਾ.
ਤਕਦੀਰ ਤਾਂ ਅਪਨੀ ਸੌਂਕਣ ਸੀ
ਤਦਬੀਰਾਂ ਸਾਥੋਂ ਨਾ ਹੋਈਯਾਂ
ਨਾ ਝਂਗ ਛੁਟਿਯਾ, ਨ ਕਾਣ ਪਾਟੇ
ਝੁਂਡ ਲਾਂਘ ਗਿਯਾ ਇਂਜ ਹੀਰਾਂ ਦਾ.
ਮੇਰੇ ਗੀਤ ਵੀ ਲੋਕ ਸੁਣੀਂਦੇ ਨੇ
ਨਾਲੇ ਕਾਫਿਰ ਆਖ ਸਦੀਂਦੇ ਨੇ
ਮੈਂ ਦਰ੍ਦ ਨੂਂ ਕਾਬਾ ਕਹ ਬੈਠਾ
ਰਬ ਨਾਂ ਰਖ ਬੈਠਾ ਪੀਡਾਂ ਦਾ.

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अमृता प्रीतम की एक कविता


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सावधान ब्लागर्स, जेल भी हो सकती है 36 बार

BV

ब्लॉगवाणी पर किसी लेख पर लगे क्लिक्स की संख्या लिखी रहती है कोष्ठक में। मगर पढ़ते हुए कोष्ठक नहीं पढ़ा जाता। अब देखिये बिना कोष्ठक के पढ़ने से क्या क्या अर्थ निकल रहे हैं:

  • मैं ब्लॉग पढ़ने के पैसे लेता हूँ…सुनिये एक और भूतपूर्व रंगकर्मी का बयान 93-बार
  • विमल की चीज़ अपनी कहने पर तुले हैं प्रमोदसिंह 46-बार
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  • सावधान ब्लागर्स, जेल भी हो सकती है 36-बार
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  • ब्लागिंग आपकी फायदा किसका? 27-बार
  • दर्द का नशा भी कोई नशा है क्या ? 25-बार
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  • चिट्ठों में साँस ले रही है देवभाषा 25-बार
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  • “अजांत्रिक” – मशीन से इंसान के प्रेम की कहानी 23-बार
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  • टिपियाने का (अजी टिप्प्न्नी करने का ) अपना मज़ा है 19-बार
  • किसी भी साईट का लिप्यांतर होगा एक क्लिक से

    अक्टूबर 10, 2007 7 comments

    भोमियो ने जब उर्दू से देवनागरी में लिप्यांतर की सुविधा शुरू की तो उन दिनों मैंने ढेरों उर्दू के पाकिस्तानी चिट्ठे देवनागरी में पढ़े। यकीन मानिये यह एक अलग तरीके का अनुभव था। कम पढ़े लिखे युवकों और युवतियों के पंजाबी और उर्दू की मिलीजुली भाषा में लिखे मासूम चिट्ठे। ज्यादातर पर ग़जलें और शेर। एक चिट्ठा मैं नहीं भूलता जिसमें एक युवक ने अपने दादा के बारे में लिखा जिनका घर यहां दिल्ली में था। बहुत ही मजेदार चिट्ठा था वह। बात पुरानी हो चुकी है इसी लिये उन चिट्ठों के लिंक तो नहीं दे पाऊंगा मगर फिलहाल कुछ उर्दू चिट्ठे आप यहां पढ़ सकते हैं

    उन्हीं दिनों मैंने आईना पर सहादत हसन मंटो की कहानी टोबा टेक सिंह प्रकाशित की थी। यह कहानी भी मैंने उर्दू की एक साईट से भोमियो द्वारा लिप्यांतर करके प्राकाशित की थी। आईना पर मंटो, अमृता प्रीतम, शिव कुमार बटालवी और गुलजार की रचनायें पढ़ने के लिये ढेरों पाठक आते हैं। कहने की जरूरत नहीं कि ये पाठक इन रचनाओं को कई अलग अलग लिपियों में पढ़ते हैं।

    मेरा बहुत पुराना एक सपना था कि इस तरह का लिप्यांतर हिंदी टूलबार में भी उपलब्ध करवाया जाये। अब वह सपना सच हो गया है।

    हिंदी टूलबार पिटारा में भोमियो बटन लगा दिये गये हैं। अब अगर आप किसी साईट की लिपि बदल कर पढ़ना चाहते हैं तो बस इच्छित लिपि के बटन पर क्लिक करें और साईट की लिपि बदल जायेगी। इसके लिये अब जरूरी नहीं कि वांछित साईट पर भोमियो का कोड लगा हो और न ही अब आपको भोमियो की साईट पर जा कर इच्छित साईट का URL लिखने की जरूरत होगी।

    इस सुविधा की घोषणा हिंदी टूलबार पिटारा के चिट्ठे पर अलग से विस्तार से की जायेगी।

    वारिस शाह नूं – अमृता प्रीतम

    अप्रैल 13, 2007 13 comments

    आज बैसाखी के अवसर पर अमृता प्रीतम की एक रचना और उसका हिंदी अनुवाद। 1947 पर लिखी गयी यह रचना वारिस शाह को संबोधित है जिन्होंने ‘हीर’ लिखी थी।

     

    वारिस शाह नूं

    आज्ज आखां वारिस शाह नूं
    कित्थे कबरां विचों बोल ते आज्ज किताबे ईश्क दा
    कोई अगला वर्का फोल

    इक रोई सी धी पंजाब दी तूं लिख लिख मारे वैण

    आज्ज लखां धिया रोंदियां तैनूं वारिस शाह नूं कैण

    उठ दर्दमंदा देया दर्दिया उठ तक्क अपना पंजाब

    आज्ज वेले लाशा विछियां ते लहू दी भरी चिनाव

    किसे ने पंजा पाणियां विच दित्ती जहर रला

    ते उणा पाणियां धरत नूं दित्ता पानी ला

    इस जरखेज जमीन दे लू लू फुटिया जहर

    गिट्ठ गिट्ठ चड़ियां लालियां ते फुट फुट चड़िया कहर

    उहो वलिसी वा फिर वण वण वगी जा

    उहने हर इक बांस दी वंजली दित्ती नाग बना

    नागां किल्ले लोक मूं, बस फिर डांग्ग ही डांग्ग,

    पल्लो पल्ली पंजाब दे, नीले पै गये अंग,

    गलेयों टुट्टे गीत फिर, त्रखलों टुट्टी तंद,

    त्रिंझणों टुट्टियां सहेलियां, चरखरे घूकर बंद

    सने सेज दे बेड़ियां, लुड्डन दित्तीयां रोड़,

    सने डालियां पींग आज्ज, पिपलां दित्ती तोड़,

    जित्थे वजदी सी फूक प्यार दी, ओ वंझली गयी गवाच,

    रांझे दे सब वीर आज्ज भुल गये उसदी जाच्च

    धरती ते लहू वसिया, कब्रां पइयां चोण,

    प्रीत दिया शाहाजादियां अज्ज विच्च मजारां रोन,

    आज्ज सब्बे कैदों* बन गये, हुस्न इश्क दे चोर

    आज्ज कित्थों लाब्ब के लयाइये वारिस शाह इक होर

     वारिस शाह से

    आज वारिस शाह से कहती हूं
    अपनी कब्र में से बोलो

    और इश्क की किताब का

    कोई नया वर्क खोलो

    पंजाब की एक बेटी रोई थी

    तूने एक लंबी दस्तांन लिखी

    आज लाखों बेटियां रो रही हैं,

    वारिस शाह तुम से कह रही हैं

    ए दर्दमंदों के दोस्त

    पंजाब की हालत देखो
    चौपाल लाशों से अटा पड़ा हैं,

    चिनाव लहू से भरी पड़ी है

    किसी ने पांचों दरियाओं में

    एक जहर मिला दिया है
    और यही पानी

    धरती को सींचने लगा है

    इस जरखेज धरती से

    जहर फूट निकला है

    देखो, सुर्खी कहां तक आ पंहुंची

    और कहर कहां तक आ पहुंचा

    फिर जहरीली हवा वन जंगलों में चलने लगी
    उसमें हर बांस की बांसुरी

    जैसे एक नाग बना दी

    नागों ने लोगों के होंठ डस लिये

    और डंक बढ़ते चले गये

    और देखते देखते पंजाब के

    सारे अंग काले और नीले पड़ गये

    हर गले से गीत टूट गया

    हर चरखे का धागा छूट गया
    सहेलियां एक दूसरे से छूट गयीं

    चरखों की महफिल विरान हो गयी

    मल्लाहों ने सारी कश्तियां

    सेज के साथ ही बहा दीं
    पीपलों ने सारी पेंगें

    टहनियों के साथ तोड़ दीं

    जहां प्यार के नगमे गूंजते थे

    वह बांसुरी जाने कहां खो गयी

    और रांझे के सब भाई

    बांसुरी बजाना भूल गये
    धरती पर लहू बरसा

    कबरें टपकने लगीं

    और प्रीत की शहजादियां

    मजारों में रोने लगीं

    आज सब कैदों* बन गये

    हुस्न इश्क के चोर

    मैं कहां से ढूंढ के लाऊं

    एक वारिस शाह और..

    (*कैदों हीर का चाचा था जो उसे  जहर दे डालता है)

    (कविता का पंजाबी संस्करण यहां से सुन कर लिखा गया है इस लिये त्रुटी की संभावना है। हिंदी अनुवाद भारतीय ज्ञानपीठ से साभार)

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