यही बिकता है आजकल ?
13Mar08
आज बहुत दिनों बाद नवभारत टाइम्स की साइट पर जाना हुआ।
देखिये तो मुख्य पृष्ठ पर कितने महत्वपूर्ण समाचार हैं!
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सही ही तो है… खोजी पत्रकारिता का चरम है यह, गणिका की फोटो खोज लाये… उपकार हुआ, थैंक्यू नवभारत.
बिल्कुल सही कह रहें हैं आप।
bhai sahabh aajkal yahi ho raha hai
jara idher bhi nazar marre
http://www.tesriaankh.blogspot.com
आपने ठीक ही इंगित किया है. लेकिन इस स्थिति के लिए क्या हमारा पाठक कम ज़िम्मेदार हैं? अखबार वाले कहते हैं कि ऐसा करने से उनकी ग्राहक संख्या बढती है. और यहाँ झूठ भी नहीं हो सकता, क्योंकि वे लोग बाकायदा मार्केट सर्वे के बाद यहाँ कहते और करते हैं. स्थिति तब ही बदलेगी जब हमारे पाठक इसी कारण इन अखबारों को ठुकरायेंगे. लेकिन फिलहाल तो मुझे इस बात की कोई उम्मीद नहीं नज़र आती. इसलिए सहने या उपेक्षा के सिवा चारा भी क्या है?
जगदीश भाई हम ब्लागरों को अपने मानसिकता, काम और योजनाओं को नये सिरे से संगठित करना होगा. अगर ऐसा नहीं करते हैं तो आलोचनाओं से नवभारत टाईम्स और अन्य समाचार पोर्टलों को नहीं पछाड़ सकते. हर ब्लागर को एक रिपोर्टर की तरह पेश आना होगा. तभी ब्लागरी भी टिकेगी और न्यूज भी बचेगी.
मुझे उम्मीद है कि धीरे-धीरे लोग इस बात को समझेंगे.
सही कः रहे हैं…यही बिकता है तो बेच रहे हैं बेचने वाले. हद्द है/
जगदीश भाई नमस्कार अजी कया दिखा रहे हे रात के समय
हम तो नवभारत की साईट पर पिछले ४-५ साल से गये ही नही उससे भी ज्यादा टाईम हो सकता है, बल्कि किसी भी इंडियन अखबार की साईट पर गये जमाना बीत गया है। हिंदी की साईट में प्रभा साक्षी या फिर कभी वेब दुनिया नही तो बीबीसी सब खबर मिल जाती है।
ये फोटो भी मारी हुई है, इसी बंदी के myspace प्रोफाइल से लेकर सभी छापे जा रहे है। ताज्जुब है इनको वो कुत्ते वाली फोटो नही दिखी (जर्मनी का विज्ञापन), हमें भी देखना था पब्लिक का क्या Reaction होता देखकर।
अरे ऊ पंजाब केसरी आदि ने इतने साल से बेच-२ के सब ही को सिखा दिया ना कि भईया यही बिकता है, तमहो भी बेचो!!