इकनॉमिक टाइम्स अब हिंदी में भी
आज सुबह उठ जब बाहर से अखबार उठाये तो एक सुखद एहसास मेरा इंतजार कर रहा था। रोज के अखबारों के साथ एक अखबार अतिरिक्त था। यह था इकनॉमिक टाइम्स का हिंदी संस्करण।
इकनॉमिक टाइम्स का हिंदी में छपना केवल एक नये अखबार का लॉंच नहीं है, यह देश के बदलते आर्थिक परिदृश्य और हिंदी को अर्थ और बाजार में मिलते महत्व को भी दर्शाता है।
यूटीवी पर होगा डिज्नी का कब्जा, टीवीएस की नयी बाइक पर विवाद, फरारी की भारत में शुरुआत, ग्राहकों को लुभाने के लिये ब्लॉग का इस्तेमाल और डीवीडी बाजार में छा रही ब्ल्यूरे तकनीक। इस तरह के समाचारों को हिंदी में पढ़ने का अलग ही मजा है।
उम्मीद है कि शेयर बाजार जैसे विषय अब केवल अंग्रेजी जानने वालों के लिये ही नहीं होंगे और अंग्रेजी न जानने वाले भी अब शेयर बाजारों में अधिक मात्रा में अपने हाथ आजमायेंगे।
अब हिंदी पढ़ने वाले इस अखबार से समृद्ध हों या नहीं इतना तय है कि इस संस्करण से हिंदी कुछ और समृद्ध हुई है।
हां, मुझको एक और अखबार पढ़ने के लिये सुबह सुबह थोड़ा और समय जरूर निकालना पड़ेगा।









इस तरह आर्थिक मामलो की हिन्दी साइटो की बाड़ आने वाली है.
हिन्दी के लिये गौरव की बात है। आम जनता की भाषा में आर्थिक समाचार आने से बहुत जनता को भी बहुत फायदे होंगे। लोगों को अतिरिक्त बिकल्प मिलेगा - फालतू के समाचारों को पढ़ने से मुक्ति मिलेगी।
अच्छी खबर।
अब व्यापर सम्बंधी ब्लॉग लिखने वाले सभी लोग ध्यान से जुट जाओ, कंटेन्ट के लिए ऑफ़र आने ही वाले है।
कहते है कि मंजिले रोकने से भी नही रोकी जाती , अगर हौसला बुलंद हो तो उसे लंगडा भी पा लेता है . यही कुछ दशा हमारे देश कि अर्थ ब्यवस्था कि भी है. आज ८.५ % का विकाश डर और कुछ बुनियादी क्षेत्रो मे जैसे आईटी मे हमारे देश के नौजवानों ने पूरी दुनिया मे भारत का जो झंडा बुलंद किया है उसपर क्यो न भारत वासी को नाज हो . लेकिन अगर वही बदती महागाई और बेरोजगारी देखे तो शयेद हम शर्म से पानी पानी हो जाते है.कहने के लिए बहुत कुछ है जैसे कि आज भी बहुत किसान आत्महत्या कर रहे है .
नक्सलवाद चरम पर है.क्षेत्रवाद का विष पूरे भारत को कमजोर कर रहा है. आदि आदि
क्या नयी शःस्त्रब्दी के भारत को इनसे कभी मुक्ति मिलेगी
कहते है कि मंजिले रोकने से भी नही रोकी जाती , अगर हौसला बुलंद हो तो उसे लंगडा भी पा लेता है . यही कुछ दशा हमारे देश कि अर्थ ब्यवस्था कि भी है. आज ८.५ % का विकाश डर और कुछ बुनियादी क्षेत्रो मे जैसे आईटी मे हमारे देश के नौजवानों ने पूरी दुनिया मे भारत का जो झंडा बुलंद किया है उसपर क्यो न भारत वासी को नाज हो . लेकिन अगर वही बदती महागाई और बेरोजगारी देखे तो शायेद हम शर्म से पानी पानी हो जाते है.
कहने के लिए बहुत कुछ है जैसे कि आज भी बहुत किसान आत्महत्या कर रहे है .
नक्सलवाद चरम पर है.क्षेत्रवाद का विष पूरे भारत को कमजोर कर रहा है. आदि आदि
क्या नयी शःस्त्रब्दी के भारत को इनसे कभी मुक्ति मिलेगी
बहुत अच्छी सूचना है, आप सबको मुबारक हो।
हिन्दी में इकाँनामिक टाइम्स का आना और वह भी एक अंग्रेज़ी समाचार पत्र समूह से वाक़ई हिन्दी की जीत का जश्न मनाने का प्रसंग है. कितना ही कोई कहे कि अंग्रेज़ी का साम्राज्य बढ़ रहा है हिन्दी के वजूद को ख़ारिज नहीं किया जा सकता.एडवरटाइज़िग अभियानों में भी अब हिन्दी का दमख़म बढ़ रहा है….लेकिन इतना भी जान लें इकॉनॉमिक टाइम्स जैसे अख़बार हिन्दी की सेवा के लिये नहीं सरक्यूलेशन की प्रतिस्पर्धा और अपनी कमाई के लिये बाज़ार में उतरे हैं …हम हिन्दी वालों को ज़्यादा खु़श होने की ज़रूरत नहीं है….ये एक नया व्यापारिक फ़लसफ़ा है जनाब.