डिड यू मीन ’रवि रतलामी’
आपको याद होगा कि एक बार जब मैंने हिंदी के कुछ चिट्ठाकारों के नाम गूगल पर हिंदी में सर्च किये तो ये नाम गूगल पर शाहरुख और अमिताभ से भी ज्यादा बार नजर आते थे। वह पोस्ट यहां है।
जहां चिट्ठाकारों की ख्याति ज्यादा है अमिताभ और शाहरुख से
अब आपको आज की बात बताते हैं। आज आइबीएन चैनल ![]()
पर एक समाचार रिपोर्ट देखी जिसमें रोहतक और अलवर में इंटेरनेट के प्रयोग के बारे में बताया गया था। मुझे याद आया कि ऐसी ही रिपोर्ट हमारे रवि जी जो कि रतलाम में रहते हैं और रवि रतलामी के नाम से जाने जाते हैं को ले कर भी आइबीएन चैनल ने बनायी थी। मैंने सोचा शायद इस रिपोर्ट को आइबीएन चैनल ने अपनी साईट पर डाल दिया हो। तो यही सोच कर मैंने गूगल पर Ravi Ratlam सर्च किया। जानते हैं गूगल बाबा ने क्या पूछा?
Did you mean: Ravi Ratlami
रवि जी आपको अब गूगल का सर्च इंजिन भी पहचानता है।






भाई जी ,हमे कोई समस्या आती है तो हम गूगल मे रवि रतलामी जी का नाम सर्च कर अपनी ब्लोग समस्या का हल कर लेते हैं।यह प्र्योग तब से जारी है जब से ब्लोग लिखना शुरू किया था।
रवि जी के बारे में जानकारी देने के लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद।
इतने नामी आदमी को तलाशेंगे तो गुगल की क्या बिसात जो रवि रतलामी को न पूछे. गुगल को बंद थोड़े ही होना है.
रवि भाई का तो हर तरफ नाम है भई!!!
“रवि रतलामी” जैसी हस्ती को अभी गूगलवा पहचानता है, आगे सारा हिन्दुस्तान पहचानेगा।
वाह, कुछ तो ये यूनीक नाम का कमाल है और कुछ रवि जी की ख्याति।
हे हे … धन्यवाद. गूगल देव की इस कृपा को आपने उजागर कर दिया.
वैसे, मैंने सर्च किया - Jagdish Bhatiya तो इसने पूछा - डिड यू मीन जगदीश भाटिया? द ब्लॉगर हू बिल्ड हिन्दी टूलबार?
चलो, दूसरी लाइन तो कोरी गप्प है, पर इसने जरूर पूछा था - did you mean Jagdish Bhatia?
मैं ने रवि की टिप्पणी पढ कर गूगल में खोजा “शास्त्री”.
जवाब आय डिड यू मीन शास्त्री फिलिप, द ओन्ली हिन्दी ब्लोगर इन इंडिया”. हां रवि जी के आधे गप के बाद मैं ने अपने बारे में पूरा गप लिख दिया है.
वैसे रवि, आपके काम को यदि स्वीकृति एवं प्रशंसा मिलती है तो हम सब को उससे बहुत खुशी होती है. हिन्दुस्तान के एक पुत्र का आदर सभी हिन्दुस्तानियों के लिये अभिमान की बात है — शास्त्री जे सी फिलिप
आज का विचार: चाहे अंग्रेजी की पुस्तकें माँगकर या किसी पुस्तकालय से लो , किन्तु यथासंभव हिन्दी की पुस्तकें खरीद कर पढ़ो । यह बात उन लोगों पर विशेष रूप से लागू होनी चाहिये जो कमाते हैं व विद्यार्थी नहीं हैं । क्योंकि लेखक लेखन तभी करेगा जब उसकी पुस्तकें बिकेंगी । और जो भी पुस्तक विक्रेता हिन्दी पुस्तकें नहीं रखते उनसे भी पूछो कि हिन्दी की पुस्तकें हैं क्या । यह नुस्खा मैंने बहुत कारगार होते देखा है । अपने छोटे से कस्बे में जब हम बार बार एक ही चीज की माँग करते रहते हैं तो वह थक हारकर वह चीज रखने लगता है । (घुघूती बासूती)
क्या बात है गुरू!!!
waah.. ye khoji wala kaam hai .. apan bhi shayad hit hee ho gaye honge..