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मंटो की कहानी – टोबा टेक सिंह

बंटवारे के दो तीन साल बाद पाकिस्तान और हिंदुस्तान की हुकूमतों को ख्याल आया कि इखलाकी क़ैदियों की तरह पागलों का तबादला भी होना चाहिए यानी जो मुसल्‌मान पागल, हिंदुस्तान के पागल-ख़ानों में हैं उन्हें पकिस्तान पहुंचा दिया जाए और जो हिंदू और सिख पाकिस्तान के पागल-ख़ानों में हैं उन्हे हिंदुस्तान के हवाले कर दिया जाए।मालूम नहीं यह बात माक़ूल थी या ग़ैर-माक़ूल , बहर-हाल दानिश-मन्‌दों के फ़ैस्‌ले के मुताबिक़ इधर उधर ऊंची सतह की कान्फ्रेंसे हुईं , और बाल-आख़िर एक दिन पागलों के तबादले के लिए मुक़र्‌रर हो गया। अच्छी तर्‌ह छान-बीन की गई। वह मुसल्‌मान पागल जिन के लवाहिक़ीन हिंदुस्तान में ही में थे, वहीं रह्‌ने दिए गए थे, जो बाक़ी थे उन को सर्‌हद पर रवाना कर दिया गया।_ यहां पाकिस्‌तान में चूंकि क़रीब क़रीब तमाम हिंदू सिख जा चुके थे, इस लिए किसी को रखने रखाने का सवाल ही न पैदा हुआ। जितने हिंदू सिख पागल थे, सब के सब पुलिस की हिफ़ाज़त में बॉर्डर पर पहुंचा दिए गए।
उधर का मालूम नहीं, लेकिन इधर लाहोर के पागल-ख़ाने में जब उस तबादले की ख़बर पहुंची तो बड़ी दिल्‌चस्‌प चिह-मी-गूइयां होन लगीं। एक मुसल्‌मान पागल जो बारह बरस से हर रोज़ बा-क़ाइदगी के साथ ” ज़मीन्‌दार ” पढ़्‌ता था उस से जब उस के एक दोस्‌त ने पूछा ” मोल्‌बी साब , यह पाकिस्‌तन क्‌या होता है”,उस ने बड़े ग़ोर-ओ-फ़िक्‌र के बाद जवाब दिया,” हिंदुस्तान में एक ऐसी जगह है जहां उस्तरे बन हैं।”
यह जवाब सुन कर उस का दोस्त मुत्‌मईन हो गया।उसी तरह एक सिख पागल ने एक दूसरे सिख पागल से पूछा “सरदार-जी हमें हिंदुस्तान क्‌यूं भेजा जा रहा है — हमें तो वहां की बोली नहीं आती?”दूसरा मुस्कुराया ” मुझे तो हिंदुस्तोड़ो की बोली आती है — हिंदुस्तानी बड़े शैतानी आकड़ आकड़ फिर्‌ते हैं।”एक दिन नहाते नहाते एक मुसल्‌मान पागल ने ” पाकिस्तान जिंदाबाद ” का नारा इस ज़ोर से बुलंद किया कि फर्श पर फिसल कर गिरा और बेहोश हो गया ।
बाज़ पागल ऐसे भी थे जो पागल नहीं थे। उन में अक्सरियत ऐसे क़ातिलों की थी जिन के रिश्तेदारों ने अफ़्‌सरों को दे दिला कर पागल-ख़ाने भिज्‌वा दिया था कि फांसी के फंदे से बच जाएं। यह कुछ कुछ समझ्‌ते थे कि हिंदुस्तान क्यूं तक़्‌सीम हुआ है और यह पाकिस्तान क्या है? लेकिन सही वाक़िआत से यह भी बे-ख़बर थे। अख़बारों से कुछ पता नहीं चलता था और पहरेदार सिपाही अनपढ़ और जाहिल थे। उन की गुफ़्‌तगू से भी वह कोई नतीजा बरामद नहीं कर सकते थे। उन को सिर्फ़ इतना मालूम था कि एक आद्मी मुहम्मद अली जिन्ना है जिस को काइदे आजम कह्‌ते हैं। उस ने मुसल्‌मानों के लिए एक `इलाहिदा मुल्क बनाया है जिस का नाम पाकिस्‌तान है। यह कहां है , उस का मह्‌ल्‌ल-ए वुक़ू` क्या है। उस के मुताल्लिक़ वह कुछ नहीं जान्‌ते थे। यही वजह है कि पागल-ख़ाने में वह सब पागल जिन का दिमाग़ पूरी तरह माऊफ़ नहीं हुआ था इस मख़्‌मसे में गिरफ़्तार थे कि वह पाकिस्तान में हैं या हिंदुस्तान में? अगर हिंदुस्तान में हैं तो पाकिस्तान कहां है? अगर वह पाकिस्तान में हैं तो यह कैसे हो सकता है कि वह कुछ अरसा पह्‌ले यहीं रह्‌ते हुए भी हिंदुस्तान में थे।
एक पागल तो पाकिस्तान और हिंदुस्तान, और हिंदुस्तान और पाकिस्तान के चक्कर में कुछ ऐसा गिरफ़्तार हुआ कि और ज़ियादा पागल हो गया। झाड़ू देते देते एक दिन दरख़्त पर चढ़ गया और टह्‌नी पर बैठ कर दो घंटे मुसल्सल तक़्‌रीर कर्‌ता रहा जो पाकिस्तान और हिंदुस्तान के नाज़ुक मसले पर थी। सिपाहियों ने उसे नीचे उतरने को कहा तो वह और ऊपर चढ़ गया। डराया धमकाया गया तो उस ने कहा — ” मैं हिंदुस्तान में रह्‌ना चाहता हूं न पाकिस्तान में — मैं इस दरख़्‌त ही पर रहूंगा।”
बड़ी मुश्किलों के बाद जब उस का दौरा सर्द पड़ा तो वह नीचे उतरा और अपने हिन्दू सिख दोस्तों से गले मिल मिल कर रोने लगा, इस ख्याल से उस का दिल भर आया था कि वह उसे छोड़ कर हिंदुस्तान चले जाएंगे।

एक एम एस सी पास रेडियो इन्जीनियर में जो मुसल्मान था और दूसरे पागलों से बिल्कुल अलग थलग बाग़ की एक ख़ास रविश पर सारा दिन ख़ामोश टहलता रह्‌ता था यह तबदीली नमूदार हुई कि उस ने तमाम कप्‌ड़े उतार कर दफ़`अदार के हवाले कर दिए और नन्‌ग धड़न्‌ग सारे बाग़ में चलना फिरना शुरू` कर दिया।

चन्‌योट के एक मोटे मुसल्मान पागल ने जो मुस्लिम लीग का सर-गर्म कार्कुन रह चुका था और दिन में पन्द्रह सोलह मर्तबा नहाया करता था यक-लख़्‌त यह आदत तर्क कर दी। उस का नाम मुहम्मद अली था। चुनांचे उस ने एक दिन अपने जंगले में एलान कर दिया कि वह काइदे आजम मुहम्मद अली जिन्ना है। उस की देखा देखी एक सिख पागल मास्टर तारा सिंघ बन गया। क़रीब था कि उस जंगले में ख़ून ख़राबा हो जाए मगर दोनों को ख़तर्‌नाक पागल क़रार दे कर `अलाहिदा `अलाहिदा बंद कर दिया गया।
लाहोर का एक नौजवान हिंदू वकील था जो मुहब्बत में ना-काम हो कर पागल हो गया था। जब उस ने सुना कि अमृतसर हिंदुस्तान में चला गया है तो उसे बहुत दुख हुआ। उसी शह्‌र की एक हिन्दू लड़्‌की से उसे मुहब्बत हो गई थी। गो उस ने उस वकील को ठुकरा दिया था मगर दीवानगी की हालत में भी वह उस को नहीं भूला था। चुनांचे उन तमाम हिन्दू और मुस्लिम लीडरों को गालियां देता था जिन्हों ने मिल मिला कर हिंदुस्तान के दो टुक्‌ड़े कर दिए। — उस की मह्‌बूबा हिंदुस्तानी बन गई और वह पाकिस्तानी।

जब तबादले की बात शुरू` हुई तो वकील को कई पागलों ने समझाया कि वह दिल बुरा न करे। उस को हिंदुस्तान भेज दिया जाएगा। उस हिंदुस्तान में जहां उस की मह्‌बूबा रह्‌ती है। मगर वह लाहोर छोड़्‌ना नहीं चाह्‌ता था। इस लिए कि उस का ख्याल था कि अमृतसर में उस की प्रेक्टिस नहीं चलेगी।

यूरोपियन वार्ड में दो ऐंग्लो-इन्डियन पागल थे। उन को जब मालूम हुआ कि हिंदुस्तान को आज़ाद कर के अन्ग्रेज़ चले गए हैं तो उन को बहुत सदमा हुआ| वह छुप छुप कर घंटों आपस में इस अहम मसले पर गुफ़्‌तगू करते रह्‌ते कि पागल-ख़ाने में उन की हैसियत किस क़िस्म की होगी। यूरोपियन वार्ड रहेगा या उड़ा दिया जाएगा। ब्रेकफ़ास्ट मिला करेगा या नहीं। क्या उन्हें डबल रोटी के बजाए बलडी इन्डियन चपाटी तो ज़ह्‌र मार नहीं करना पड़ेगी?
एक सिख था जिस को पागल-ख़ाने में दाख़िल हुए पन्द्रह बरस हो चुके थे। हर वक़्त उस की ज़बान से यह `अजीब-ओ-ग़रीब अल्फ़ाज़ सुन्‌ने में आते थे _ ” ऊपड़ दी गुड़ गुड़ दी एनक्स दी बे ध्याना दी मुंग दी दाल आफ़ दी लालटेन।” दिन को सोता था न रात को। पहरेदारों का यह कह्‌ना था कि पन्द्रह बरस के तवील अर्‌से में वह एक लह्‌ज़े के लिए भी नहीं सोया। लेटता भी नहीं था। अलबत्ता कभी कभी किसी दीवार के साथ टेक लगा लेता था।

हर वक़्‌त खड़े रह्‌ने से उस के पांव सूज गए थे। पिंडलियां भी फूल गई थीं। मगर इस जिस्मानी तकलीफ़ के बावजूद लेट कर आराम नहीं कर्‌ता था। हिंदुस्तान , पाकिस्तान और पागलों के तबादिले के मुत्तालिक जब कभी पागल-ख़ाने में गुफ़्‌तगू होती थी तो वह ग़ोर से सुन्‌ता था। कोई उस से पूछ्‌ता कि उस का क्या ख़ियाल है तो वह बड़ी सन्जीदगी से जवाब देता” ऊपड़ दी गुड़ गुड़ दी एनकस दी बे ध्याना दी मूंग दी दाल आफ़ दी पाकिस्तान गवर्न्मन्ट।”

लेकिन बाद में ” आफ़ दी पाकिस्तान गवर्न्मन्ट” की जगह ” आफ़ दी टोबा टेक सिंघ गवर्न्मन्ट” ने ले ली और उस ने दूसरे पागलों से पूछ्‌ना शुरू किया कि टोबा टेक सिंघ कहां है जहां का वह रह्‌ने वाला है। लेकिन किसी को भी मालूम नहीं था कि वह पाकिस्तान में है या हिंदुस्तान में। जो बताने की कोशिश करते थे वह खुद इस उलझावों में गिरिफ़्तार हो जाते थे कि सियालकोट पह्‌ले हिंदुस्तान में होता था पर अब सुना है कि पाकिस्तान में है। क्या पता है कि लाहोर जो अब पाकिस्तान में है कल हिंदुस्तान में चला जाए। या सारा हिंदुस्तान ही पाकिस्तान बन जाए। और यह भी कौन सीने पर हाथ रख कर कह सकता था कि हिंदुस्तान और पाकिस्तान दोनों किसी दिन सिरे से गायब ही हो जाएं।

इस सिख पागल के केस छिदरे हो के बहुत मुख़्तसर रह गए थे| चूंकि बहुत कम नहाता था इस लिए दाढ़ी और सर के बाल आपस में जम गए थे। जिन के बाइस उस की शक्ल बड़ी भयानक हो गई थी। मगर आद्‌मी बे-ज़रर था। पन्द्रह बरसों में उस ने कभी किसी से झगड़ा फ़साद नहीं किया था। पागल-ख़ाने के जो पुराने मुलाज़िम थे वह उस के मुत्तलिक इतना जानते थे कि टोबा टेक सिंह में उस की कई ज़मीनें थीं। अच्छा खाता पीता ज़मीन-दार था कि अचानक दिमाग़ उलट गया। उस के रिश्तेदार लोहे की मोटी मोटी ज़न्जीरों में उसे बांध कर लाए और पागल-ख़ाने में दाख़िल करा गए।

महीने में एक बार मुलाक़ात के लिए यह लोग आते थे और उस की ख़ैर ख़ैरियत दर्याफ़्त कर के चले जाते थे। एक मुद्दत तक यह सिलसिला जारी रहा। पर जब पाकिस्तान , हिंदुस्तान की गड़बड़ शुरू हुई तो उन का आना बन्द हो गया।

उस का नाम बिशन सिंघ था मगर सब उसे टोबा टेक सिंघ कह्‌ते थे। उस को इतना मालूम नहीं था कि दिन कौन सा है , महीना कौन सा है , या कितने साल बीत चुके हैं। लेकिन हर महीने जब उस के अज़ीज़-ओ-अक़ारिब उस से मिलने के लिए आते थे तो उसे अपने आप पता चल जाता था। चुनांचे वह दफादार से कह्‌ता कि उस की मुलाक़ात आ रही है। उस दिन वह अच्छी तरह नहाता , बदन पर ख़ूब साबुन घिसता और सर में तेल लगा कर कंघा करता , अपने कपड़े जो वह कभी इसतेमाल नहीं करता था निकलवा के पहनता और यूं सज बन कर मिलने वालों के पास जाता। वह उस से कुछ पूछ्ते तो वह ख़ामोश रह्‌ता या कभी कभार ” ऊपड़ दी गुड़ गुड़ दी एनकस दी बे ध्याना दी मूंग दी दाल आफ़ दी लाल्टेन ” कह देता।
उस की एक लड़्‌की थी जो हर महीने एक उंगली बढ़ती बढ़ती पन्द्रह बरसों में जवान हो गई थी। बिशन सिंघ उस को पहचानता ही नहीं था। वह बच्ची थी जब भी अपने बाप को देख कर रोती थी , जवान हुई तब भी उस की आंखों से आंसू बह्‌ते थे।

पाकिस्तान और हिंदुस्तान का क़िस्सा शुरू` हुआ तो उस ने दूसरे पागलों से पूछ्‌ना शुरू` किया कि टोबा टेक सिंघ कहां है? जब इत्‌मीनान-बख़्‌श जवाब न मिला तो उस की कुरेद दिन-बदिन बढ़्‌ती गई। अब मुलाक़ात भी नहीं आती थी। पह्‌ले तो उसे अपने आप पता चल जाता था कि मिलने वाले आ रहे हैं , पर अब जैसे उस के दिल की आवाज़ भी बन्द हो गई थी जो उसे उन की आमद की ख़बर दे दिया करती थी।

उस की बड़ी ख़्वाहिश थी कि वह लोग आएं जो उस से हम-दर्दी का इज़हार करते थे और उस के लिए फल , मिठाइयां और कपड़े लाते थे। वह अगर उन से पूछ्‌ता कि टोबह टेक सिंघ कहां है तो वह यक़ीनन उसे बता देते कि पाकिस्तान में है या हिंदुस्तान में। क्योंकि उस का ख्याल था कि वह टोबा टेक सिंघ ही से आते हैं जहां उस की ज़मीनें हैं।
पागल-ख़ाने में एक पागल ऐसा भी था जो खुद को ख़ुदा कह्‌ता था। उस से जब एक रोज़ बिशन सिंघ ने पूछा कि टोबा टेक सिंघ पाकिस्तान में है या हिंदुस्तान में , तो उस ने हस्‌ब-ए `आदत क़ह्‌क़हा लगाया और कहा “वह पाकिस्तान में है न हिंदुस्तान में, इस लिए कि हम ने अभी तक हुक्म नहीं दिया। “

बिशन सिंघ ने इस ख़ुदा से कई मरतबा बड़ी मिन्नत समाजत से कहा कि वह हुक्‌म दे दे ताकि झंझट ख़त्म हो मगर वह बहुत मसरूफ़ था इसलिए कि उसे और बे-शुमार हुक्म देने थे। एक दिन तन्ग आ कर वह उस पर बरस पड़ा “ऊपड़ दी गुड़ गुड़ दी एनक्स दी बे ध्याना दी मुंग दी दाल आफ़ वाहे गूरू जी दा ख़ालसा ऐंड वाहे गूरू जी की फ़तह — जो बोले सो निहाल , सत सरी अकाल।”

उस का शायद यह मतलब था कि तुम मुसल्मानों के ख़ुदा हो — सिखों के ख़ुदा होते तो ज़रूर मेरी सुनते ।

तबादले से कुछ दिन पहले टोबा टेक सिंघ का एक मुसल्मान जो उस का दोस्त था मुलाक़ात के लिए आया। पह्‌ले वह कभी नहीं आया था। जब बिशन सिंघ ने उसे देखा तो एक तरफ़ हट गया और वापस जाने लगा। मगर सिपाहियों ने उसे रोका ” यह तुम से मिलने आया है — तुम्हारा दोस्त फ़ज़ल दीन है। “

बिशन सिंघ ने फ़ज़ल दीन को एक नज़र देखा और कुछ बड़बड़ाने लगा। फ़ज़ल दीन ने आगे बढ़ कर उस के कन्धे पर हाथ रखा”मैं बहुत दिनों से सोच रहा था कि तुम से मिलूं लेकिन फ़ुरसत ही न मिली, तुम्हारे सब आदमी ख़ैरियत से हिंदुस्तान चले गए थे, मुझ से जितनी मदद हो सकी , मैं ने की, तुम्‌हारी बेटी रूप कौर . . . . “

वह कुछ कह्‌ते कह्‌ते रुक गया। बिशन सिंघ कुछ याद करने लगा ” बेटी रूप कौर ” _

फ़ज़ल दीन ने रुक रुक कर कहा ” हां . . . . वह . . . . वह भी ठीक ठाक है — उन के साथ ही चली गई थी। “
बिशन सिंघ ख़ामोश रहा। फ़ज़ल दीन ने कह्‌ना शुरू` किया_ ” उंहों ने मुझ से कहा था कि तुम्हारी ख़ैर ख़ैरियत पूछ्ता रहूं — अब मैं ने सुना है कि तुम हिंदुस्तान जा रहे हो — भाई बल्बेसर सिंघ और भाई वधावा सिंघ से मेरा सलाम कह्‌ना — और बहन अमरित कौर से भी . . . . भाई बल्बेसर से कह्‌ना, फ़ज़ल दीन राज़ी खुशी है — वह भूरी भैंसें जो वह छोड़ गए थे, उन में से एक ने कट्‌टा दिया है — दूस्‌री के कट्‌टी हुई थी पर वह छह दिन की हो के मर गई . . . . और . . . . मेरी लाइक़ जो ख़िद्‌मत हो , कहना , मैं हर वक़्त तैयार हूं . . . . और यह तुम्‌हारे लिए थोड़े से मरूंडे लाया हूं। “

बिशन सिंघ ने मरूंडों की पोटली ले कर पास खड़े सिपाही के हवाले कर दी और फ़ज़ल दीन से पूछा “टोबा टेक सिंघ कहां है ?”

फ़ज़ल दीन ने क़द्रे हैरत से कहा ” कहां है? — वहीं है जहां था “

बिशन सिंघ ने फिर पूछा ” पाकिस्तान में या हिंदुस्तान में ? “

” हिंदुस्तान में — नहीं नहीं पाकिस्तान में ” फ़ज़ल दीन बोखला सा गया।

बिशन सिंघ बड़्‌बड़ाता हुआ चला गया _ ” ऊपड़ दी गुड़ गुड़ दी एनक्‌स दी बे ध्‌याना दी मुंग दी दाल आफ़ दी आफ़ दी पाकिस्तान ऐंड हिंदुस्तान आफ़ दी दूर फिटे मुंह ! “
तबादले के तैयारियां मुकम्मल हो चुकी थीं। इधर से उधर और उधर से इधर आने वाले पागलों की फ़हरिस्तें पहुंच गई थीं और तबादले का दिन भी मुक़र्रर हो चुका था।

सख़्त सर्दियां थीं जब लाहोर के पागल-ख़ाने से हिन्‌दू सिख पागलों से भरी हुई लारियां पुलिस के मुहाफ़िज़ दस्ते के साथ रवाना हुई मुत्तलिक अफ़सर भी हमराह थे। वाघा के बार्डर पर तरफ़ैन के सुपरिंटेडेंट एक दूसरे से मिले और इब्तिदाई कारवाई ख़त्म होने के बाद तबादला शुरू` हो गया जो रात भर जारी रहा।

पागलों को लारियों से निकालना और दूसरे अफ़सरों के हवाले करना बड़ा कठिन काम था। बाज़ तो बाहर निकलते ही नहीं थे। जो निकलने पर रज़ा-मन्द होते थे, उन को संभालना मुश्‌किल हो जाता था, क्योंकि इधर उधर भाग उठते थे , जो नन्गे थे उन को कप्‌ड़े पनाए जाते तो वह फाड़ कर अपने तन से जुदा कर देते। कोई गालियां बक रहा है, कोई गा रहा है, _ आपस में लड़ झगड़ रहे हैं, _ रो रहे हैं , बिलख रहे हैं, कान पड़ी आवाज़ सुनाई नहीं देती थी, पागल औरतों का शोर-ओ-ग़ौग़ा अलग था और सर्दी इतनी कड़ाके की थी कि दांत से दांत बज रहे थे ।
पागलों की अकसरियत इस तबादले के हक़ में नहीं थी। इसलिए कि उन की समझ में नहीं आता था कि उंहें अपनी जगह से उखाड़ कर कहां फेंका जा रहा है। वह चन्द जो कुछ सोच समझ सकते थे ” पाकिस्तान जिंदाबाद” और ” पाकिस्तान मुर्दाबाद” के नारे लगा रहे थे। दो तीन मर्तबा फ़साद होते होते बचा , क्योंकि बाज़ मुसल्मानों ओर सिखों को यह नारे सुन कर तेश आ गया था।

बिशन सिंघ की बारी आई और वाघा के उस पार मुत्तलिक अफ़सर उस का नाम रिजिस्टर में दरज करने लगा तो उस ने पूछा ” टोबा टेक सिंघ कहां है? — पाकिस्तान में या हिंदुस्तान में ? “

मुत्तलिक अफ़सर हंसा ” पाकिस्तान में “

यह सुन कर बिशन सिंघ उछल कर एक तरफ़ हटा और दौड़ कर अपने बाक़ी मांदह साथियों के पास पहुंच गया। पाकिस्तानी सिपाहियों ने उसे पकड़ लिया और दूसरी तरफ़ ले जाने लगे , मगर उस ने चलने से इन्कार कर दिया “टोबा टेक सिंघ यहां है — ” और ज़ोर ज़ोर से चिल्लाने लगा _ ” ऊपड़ दी गुड़ गुड़ दी एनक्स दी बे ध्याना दी मुंग दी दाल आफ़ टोबा टेक सिंघ ऐंड पाकिस्तान “
उसे बहुत समझाया गया कि देखो अब टोबा टेक सिंघ हिंदुस्तान में चला गया है,अगर नहीं गया तो उसे फ़ौरन वहां भेज दिया जाएगा। मगर वह न माना। जब उस को ज़बर्दस्ती दूसरी तरफ़ ले जाने की कोशिश की गई तो वह दर्मियान में एक जगह इस अन्दाज़ में अपनि सूजी हुई टांगों पर खड़ा हो गया जैसे अब उसे कोई ताक़त वहां से नहीं हिला सकेगी।

आदमी चूंकि बे-ज़रर था इस लिए उस से मज़ीद ज़बर्दस्ती न की गई , उस को वहीं खड़ा रह्‌ने दिया गया और तबादले का बाक़ी काम होता रहा।

सूरज निकलने से पहले साकत-ओ-सामत बिशन सिंघ के हल्क़ से एक फ़लक-शिगाफ़ चीख़ निकली। इधर उधर से कई अफ़सर दौड़े आए और देखा कि वह आद्‌मी जो पन्द्रह बरस तक दिन रात अप्‌नी टांगों पर खड़ा रहा , औंधे मुंह लेटा है। उधर ख़ारदार तारों के पीछे हिंदुस्तान था, इधर वैसे ही तारों के पीछे पाकिस्तान! दर्मियान में ज़मीन के उस टुकड़े पर जिस का कोइ नाम नहीं था। टोबह टेक सिंघ पड़ा था।

इसे भी पढ़ें
मंटो की कहानी – “खोल दो”


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  1. अगस्त 8, 2007 को 9:29 अपराह्न पर | #1

    यह कहानी तो बहुत ही मर्मस्पर्शी है । मैं इसे पहले भी पढ़ चुकी हूँ । आज आपके चिट्ठे में आकर अच्छा लगा । एक बार फिर से पंजाबी के अक्षरों को पढ़ने का अवसर मिला । धन्यवाद ।
    घुघूती बासूती

  2. अगस्त 8, 2007 को 9:43 अपराह्न पर | #2

    मंटो तो महान कहानीकार माने जाते हैं…।
    बहुत अच्छा किया यह कहानी प्रस्तुत कर्… बधाई स्वीकारें।

  3. अगस्त 9, 2007 को 3:38 पूर्वाह्न पर | #3

    I have heared about so it was nice to get more info on this. thank you for sharing

  4. अगस्त 10, 2007 को 12:03 पूर्वाह्न पर | #4

    बहुत आभार. अच्छी मर्म स्पर्शी कहानी लेकर आये हैं. बहुत पहले पढ़ी थी कभी.

  5. Pankaj Battu
    जुलाई 17, 2009 को 6:24 अपराह्न पर | #5

    Classic work of Manto. I am a great fan of Manto. May his soul rest in peace.
    Like you effort to popularise hindi on the net. I dont know hindi typing. Just downloaded PITARA toolbar. Hope my next comment/submission be in HINDI.

    Have a nice day !

  6. abhinav
    जून 4, 2010 को 2:13 अपराह्न पर | #6

    This story is very nice and interesting.This story adds a lot of knowledge and emotionsto our mind. Manto is great storywriter.I am big fann of his.

  7. vara prasad.v
    अक्टूबर 27, 2010 को 3:49 अपराह्न पर | #7

    Aap ka Sahitya Achha Hai Aur Aap Aage bhi bahuth kuch likhein….

  1. अक्टूबर 10, 2007 को 10:59 अपराह्न पर | #1

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