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कैसे बढ़ती शेयर मार्किट कर रही है गरीब के आटा और दाल महंगे

एक ओर जहां शेयर बाजार के जानकार यहां निवेश करके मालामाल हो रहे हैं वहीं बेचारा आम आदमी जिसका इस शेयर बाजार से कुछ लेना देना नहीं है और जो कि अपनी दो जून की रोटी मुशकिलों से जुगाड़ पाता है उस पर इस सब का उल्टा असर हो रहा है और उस गरीब को अपने रोज के आटा दाल के लिये अधिक कीमतें देनी पड़ रही हैं। इस सब की वजह यह है कि अर्थव्यवस्था में बढ़ते मुद्रा विस्तार का प्रबंधन सरकार ठीक से नहीं कर पा रही है और साथ ही सराकार तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था में किसानों को (जो की देश की आबादी का साठ प्रतिशत हैं) शामिल नहीं कर पायी है। कृषी के विकास की निचली दर का सीधा असर खाद्य पदार्थों की पूर्ती पर पड़ा है जिससे खाद्य पदार्थों की कीमतों में बेतहाशा वृद्धी हुई है। गरीब अपनी आय का आधा खर्च अपने खान पान पर करता है जबकी अमीर अपनी आय का दस प्रतिशत से भी कम अपने खान पान पर खर्च करता है, इससे आप समझ सकते हैं कि बढ़ती महंगाई किस पर ज्यादा असर दिखाती है।यह सब कैसे होता है इसे समझने के लिये आईये देसी तथा विदेशी निवेश, मुद्रा के विस्तार, ब्याज की दर और मंहगाई के आपस में रिश्ते को जरा आसान भाषा में समझने की कोशिश करते हैं। जब अर्थव्यवस्था का विकास तेजी से होता है तो अर्थव्यवस्था में मुद्रा का विस्तार भी होने लगता है क्योंकि अर्थव्यवस्था का विस्तार होता है उद्योगों, graph120.pngसेवाओं, नौकरियों और उत्पादों में विस्तार से। इस विस्तार से लोगों को अधिक धन मिलता है जो कि मांग को बढ़ाता है और फिर पूर्ती बढ़ाने के लिये और विस्तार होता है। इस विस्तार में सहयोगी होते है निवेश और ऋण। यहां ध्यान दें कि यह निवेश और ऋण देसी और विदेशी दोनो तरह के हो सकते हैं। इस सब के कारण अर्थव्यवस्था में जयादा लिक्विडिटी(तरलता) आ जाती है यानी मुद्रा का विस्तार अर्थात मुद्रास्फीति। लोगों के हाथ में ज्यादा पैसा अर्थात ज्यादा उत्पादों और सेवाओं की मांग। अब जब इस मांग के बराबर पूर्ती नहीं हो पाती है और बाकी सारे घटक नहीं बदलते हैं तो मंहगाई बढ़ती है। इस महंगाई की बढ़ती दर को रोकने के लिये हाल ही में सरकार नें CRR की दरें बढ़ाईं। CRR यानी कैश रिजर्व रेशो, बैंकों को प्राप्त जमाओं का वह हिस्सा होता है जिसे बैंक, रिजर्व बैंक के पास रखते हैं। मान लीजिये यदि CRR की दर 7 % है और बैंको के पास 100 रुपये जमा हैं तो वे केवल 93 रु का ऋण ही दे पायेंगे। इस प्रकार सरकार मुद्रा के प्रसार में कमी करके अर्थव्यवस्था में मांग की कमी करती है। जब बैंकों के पास ऋण देने के लिये कम पैसा होगा तो बैंक ऋण पर ब्याज की दरें बढा देंगे और साथ ही बचत पर भी ब्याज की दरें बढ़ा देंगे। (जैसा की अभी हाल ही में दो बार हुआ।) इससे मंहगाई पर तो तत्कालीन असर हो जाता है मगर दीर्ध अवधी में मंहगे ऋणों के कारण उद्योगों के विस्तार पर असर पड़ता है जो कि अर्थव्यवस्था की तेजी को धीमा कर देता है।

इसके अलावा विदेशों से अप्रवासियों तथा विदेशी संस्थानों द्वारा तेजी से बढ़ते निवेश का प्रबंधन भी रिजर्व बैंक को करना होता है क्योंकि अर्थव्यवस्था की तेजी के कारण इन विदेशी निवेशों में बेतहाशा वृद्धी हुई है। विदेशी निवेश अपने साथ विदेशी मुद्रा ले कर आते हैं। रिजर्व बैंक विदेशी मुद्रा को रुपयों के बदले खरीदता है जिससे और अधिक मुद्रा का विस्तार होता है। पिछले दो बार में CRR की बढ़ोत्तरी से जो मुद्रा के विस्तार में कमी की गयी उसका असर विदेशों से आते निवेश तथा ऋणों ने समाप्त कर दिया। जहां 0.5% की CRR दर में वृद्धी ने अर्थव्यवस्था से14000 करोड़ रु की मुद्रा को कम किया वहीं इस वर्ष के पहले चार महीनों में अर्थव्यवस्था में लगभग 46000 करोड़ रुपये विदेशी मुद्रा के रूप में आ गये। इसका असर यह हुआ कि रिजर्व बैंक ने विदेशी मुद्रा की खरीद में कमी कर दी जिससे रुपया मजबूत होने लगा। रुपये की कम समय में इतनी मजबूती निर्यातकों के लिये तो मारक होती ही है, सस्ते आयात घरेलू उद्योगों पर भी बुरा असर डालते हैं।

आप यह जान कर हैरान न हों कि अब अर्थशास्त्र के ज्ञाता भी इस अर्थव्यवस्था की इस तेजी से डरने लगे हैं। जहां चीन कई वर्षों से लगातार 10% से अधिक की विकास दर होने पर भी मुद्रास्फीती को 2-2.5% के आसपास रखने में कामयाब रहा है वहीं खराब मुद्रा प्रबंधन के कारण हम 9.4% के विकास पर ही हांफने लगे हैं।

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  1. जून 2, 2007 को 8:05 अपराह्न पर | #1

    china has kept its currency pegged v/s india has it floating. China does have extreme polarization of money too. This is something that will happen until taxation is streamlined and the smarter of the population grow to fill relatively higher paying jobs.

  2. जून 2, 2007 को 8:33 अपराह्न पर | #2

    बढ़ता पूंजी बाज़ार गलोब्ल विषय है। यह कहना गलत नहीं होगा, विदेषी बैंकों की मिली भगत है। रू मज़बूत हो रहा है या डालर कमज़ोर, यह भी चर्चा का विषय है।

    मगर आम आदमी रू से दूर ज़रूर होता जा रहा है।

  3. जून 3, 2007 को 10:06 पूर्वाह्न पर | #3

    बहुत अच्छा लेख है, आपने आम बोलचाल की भाषा मे, अर्थव्यवस्था के गूढ बातों को समझाने की कोशिश की है, आपका यह प्रयास सराहनीय है। ऐसी कई बाते है जो आम आदमी के ऊपर से निकल जाती है, आप जैसे पेशेवर लोगों की मदद से सुलभ, सरल भाषा मे इन्टरनैट पर वे सभी मौजूद रहेगी तो बेहतर रहेगा।

  4. जून 3, 2007 को 2:12 अपराह्न पर | #4

    भाटिया जीं, मैं अर्थशास्त्र का विद्यार्थी रहा हूँ, अत: आपके लेख के अंश अपने लेखों
    में उपयोग में लाऊंगा। आपका लेख उपयोगी है। दीपक भारत दीप

  5. जून 4, 2007 को 8:18 अपराह्न पर | #5

    Came across your blog. can you post links to your articles at http://www.bestofindya.com under ‘Hindi’ category.

  1. अप्रैल 15, 2008 को 5:47 अपराह्न पर | #1

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