Home > कविता, पंजाबी, हिंदी, Hindi, India, Punjabi > वारिस शाह नूं – अमृता प्रीतम

वारिस शाह नूं – अमृता प्रीतम

आज बैसाखी के अवसर पर अमृता प्रीतम की एक रचना और उसका हिंदी अनुवाद। 1947 पर लिखी गयी यह रचना वारिस शाह को संबोधित है जिन्होंने ‘हीर’ लिखी थी।

 

वारिस शाह नूं

आज्ज आखां वारिस शाह नूं
कित्थे कबरां विचों बोल ते आज्ज किताबे ईश्क दा
कोई अगला वर्का फोल

इक रोई सी धी पंजाब दी तूं लिख लिख मारे वैण

आज्ज लखां धिया रोंदियां तैनूं वारिस शाह नूं कैण

उठ दर्दमंदा देया दर्दिया उठ तक्क अपना पंजाब

आज्ज वेले लाशा विछियां ते लहू दी भरी चिनाव

किसे ने पंजा पाणियां विच दित्ती जहर रला

ते उणा पाणियां धरत नूं दित्ता पानी ला

इस जरखेज जमीन दे लू लू फुटिया जहर

गिट्ठ गिट्ठ चड़ियां लालियां ते फुट फुट चड़िया कहर

उहो वलिसी वा फिर वण वण वगी जा

उहने हर इक बांस दी वंजली दित्ती नाग बना

नागां किल्ले लोक मूं, बस फिर डांग्ग ही डांग्ग,

पल्लो पल्ली पंजाब दे, नीले पै गये अंग,

गलेयों टुट्टे गीत फिर, त्रखलों टुट्टी तंद,

त्रिंझणों टुट्टियां सहेलियां, चरखरे घूकर बंद

सने सेज दे बेड़ियां, लुड्डन दित्तीयां रोड़,

सने डालियां पींग आज्ज, पिपलां दित्ती तोड़,

जित्थे वजदी सी फूक प्यार दी, ओ वंझली गयी गवाच,

रांझे दे सब वीर आज्ज भुल गये उसदी जाच्च

धरती ते लहू वसिया, कब्रां पइयां चोण,

प्रीत दिया शाहाजादियां अज्ज विच्च मजारां रोन,

आज्ज सब्बे कैदों* बन गये, हुस्न इश्क दे चोर

आज्ज कित्थों लाब्ब के लयाइये वारिस शाह इक होर

 वारिस शाह से

आज वारिस शाह से कहती हूं
अपनी कब्र में से बोलो

और इश्क की किताब का

कोई नया वर्क खोलो

पंजाब की एक बेटी रोई थी

तूने एक लंबी दस्तांन लिखी

आज लाखों बेटियां रो रही हैं,

वारिस शाह तुम से कह रही हैं

ए दर्दमंदों के दोस्त

पंजाब की हालत देखो
चौपाल लाशों से अटा पड़ा हैं,

चिनाव लहू से भरी पड़ी है

किसी ने पांचों दरियाओं में

एक जहर मिला दिया है
और यही पानी

धरती को सींचने लगा है

इस जरखेज धरती से

जहर फूट निकला है

देखो, सुर्खी कहां तक आ पंहुंची

और कहर कहां तक आ पहुंचा

फिर जहरीली हवा वन जंगलों में चलने लगी
उसमें हर बांस की बांसुरी

जैसे एक नाग बना दी

नागों ने लोगों के होंठ डस लिये

और डंक बढ़ते चले गये

और देखते देखते पंजाब के

सारे अंग काले और नीले पड़ गये

हर गले से गीत टूट गया

हर चरखे का धागा छूट गया
सहेलियां एक दूसरे से छूट गयीं

चरखों की महफिल विरान हो गयी

मल्लाहों ने सारी कश्तियां

सेज के साथ ही बहा दीं
पीपलों ने सारी पेंगें

टहनियों के साथ तोड़ दीं

जहां प्यार के नगमे गूंजते थे

वह बांसुरी जाने कहां खो गयी

और रांझे के सब भाई

बांसुरी बजाना भूल गये
धरती पर लहू बरसा

कबरें टपकने लगीं

और प्रीत की शहजादियां

मजारों में रोने लगीं

आज सब कैदों* बन गये

हुस्न इश्क के चोर

मैं कहां से ढूंढ के लाऊं

एक वारिस शाह और..

(*कैदों हीर का चाचा था जो उसे  जहर दे डालता है)

(कविता का पंजाबी संस्करण यहां से सुन कर लिखा गया है इस लिये त्रुटी की संभावना है। हिंदी अनुवाद भारतीय ज्ञानपीठ से साभार)

इसे भी पढ़ें

अमृता प्रीतम की कुछ कविताएं

अमृता प्रीतम की एक कविता

“बिरह” का सुलतान – शिव कुमार बटालवी

About these ads
  1. अप्रैल 14, 2007 को 1:57 पूर्वाह्न पर | #1

    ਬਹੋਤ ਵਧਿਯਾ, ਤੇ ਲੋਜੀ ਹੁਣ ਪਂਜਾਬੀ ਵਿਚ ਵੀ ਪਢ਼ ਲੋ

    ਅੱਜ ਆਖਾਂ ਵਾਰਿਸ ਸ਼ਾਹ ਨੂੰ ਕਿਤੋਂ ਕਬੱਰਾਂ ਵਿਚੋਂ ਬੋਲ,
    ਤੇ ਅੱਜ ਕਿਤਾਬੇ-ਇਸ਼ਕ ਦਾ ਕੋਈ ਅਗਲਾ ਵਰਕਾ ਫੋਲ,
    ਇਕ ਰੋਈ ਸੀ ਧੀ ਪੰਜਾਬ ਦੀ ਤੂੰ ਲਿਖ ਲਿਖ ਮਾਰੇ ਵੈਨ,
    ਅੱਜ ਲੱਖਾਂ ਧੀਆਂ ਰੋਂਦੀਆਂ ਤੈਨੂੰ ਵਾਰਿਸ ਸ਼ਾਹ ਨੂੰ ਕਹਿਨ,
    ਉਠ ਦਰਮਾਨਦਾਂ ਦਿਆਂ ਦਰਦਿਆ ਉਠ ਤੱਕ ਅਪਣਾ ਪੰਜਾਬ,
    ਅੱਜ ਬੇਲੇ ਲਾਸ਼ਾਂ ਵਿਸ਼ੀਆਂ ਤੇ ਲਹੂ ਦੀ ਭਰੀ ਚਨਾਬ,
    ਕਿਸੇ ਨੇ ਪੰਜਾਂ ਪਾਣੀਆਂ ਵਿੱਚ ਦਿੱਤਾ ਜ਼ਹਿਰ ਰੱਲਾ,
    ਤੇ ਉਹਨਾ ਪਾਣੀਆਂ ਧਰਤ ਨੂੰ ਦਿੱਤਾ ਪਾਣੀ ਲਾ,
    ਜਿਥੇ ਵਜਦੀ ਫੂਕ ਪਿਆਰ ਦੀ ਵੇ ਉਹ ਵੰਝਲੀ ਗਈ ਗੁਆਚ,
    ਰਾਂਝੇ ਦੇ ਸੱਬ ਵੀਰ ਅੱਜ ਭੁਲ ਗਏ ਉਸਦੀ ਜਾਚ,
    ਧਰਤੀ ਤੇ ਲਹੂ ਵਸੀਆ, ਕੱਬਰਾਂ ਪਈਆਂ ਚੋਣ,
    ਪਰੀਤ ਦਿਆਂ ਸ਼ਹਿਜਾਦਿਆਂ ਅੱਜ ਵਿੱਚ ਮਜ਼ਾਰਾਂ ਰੌਣ,
    ਅੱਜ ਸੱਬ ‘ਕੈਦੋਂ’ ਬਣ ਗਏ, ਹੁਸਨ ਇਸ਼ਕ ਦੇ ਚੋਰ,
    ਅੱਜ ਕਿਥੋਂ ਲਿਆਈਏ ਲੱਭ ਕੇ ਵਾਰਿਸ ਸ਼ਾਹ ਇਕ ਹੋਰ,
    ਅੱਜ ਆਖਾਂ ਵਾਰਿਸ ਸ਼ਾਹ ਨੂੰ ਕਿਤੋਂ ਕਬੱਰਾਂ ਵਿਚੋਂ ਬੋਲ,
    ਤੇ ਅੱਜ ਕਿਤਾਬੇ-ਇਸ਼ਕ ਦਾ ਕੋਈ ਅਗਲਾ ਵਰਕਾ ਫੋਲ।

  2. अप्रैल 14, 2007 को 1:08 अपराह्न पर | #2

    शुक्रिया इसे हम तक पहुँचाने के लिए !

  3. अप्रैल 14, 2007 को 6:15 अपराह्न पर | #3

    धन्यवाद इसे यहां पोस्ट करने के लिये!

  4. अप्रैल 15, 2007 को 8:21 पूर्वाह्न पर | #4

    बैसाखी की हार्दिक बधाई. और इस रचना के लिए धन्यवाद. मैं यह पहली बार पढ़ रहा हूं. सुकून इस बात का है कि मरहूम अमृता जी ने अपनी अंतिम सांस पंजाब के कमोबेश शांत हालात मे ली थी. कविता पढ़कर अस्सी के दशक का पंजाब याद आ गया.

  5. अप्रैल 16, 2007 को 10:12 पूर्वाह्न पर | #5

    ८-१० वर्ष पूर्व यह कविता कथादेश के एक अंक में कविता पोस्टर के रूप में देखी-पढ़ी थी. इतनी अच्छी लगी थी कि इसे निकाल कर सुरक्षित रख लिया था . आपके माध्यम से इसे एक बार पुनः पढने का मौका मिला . आभारी हूं .

  6. अप्रैल 21, 2007 को 11:37 पूर्वाह्न पर | #6

    ਪੰਜਾਬੀ ਵੈਬ-ਸਾਈਟ ਪ੍ਰਕਾਸ਼ਿਤ ਕਰਨ ਦੀ ਕੋਸ਼ਿਸ਼ ਕਰ ਰਿਹਾ ਹਾਂ। ਵਿਸ਼ਵ ਭਰ ਵਿਚ ਰਹਿ ਰਹੇ ਸਾਰੇ ਪੰਜਾਬੀਆਂ ਦੇ ਪਿਆਰ ਦੀ ਆਸ ਵਿਚ।
    ਸੁਤਤੰਰ ਸਿੰਘ

  7. अप्रैल 21, 2007 को 11:38 पूर्वाह्न पर | #7

    ਪੰਜਾਬੀ ਵੈਬ-ਸਾਈਟ ਪ੍ਰਕਾਸ਼ਿਤ ਕਰਨ ਦੀ ਕੋਸ਼ਿਸ਼ ਕਰ ਰਿਹਾ ਹਾਂ। ਵਿਸ਼ਵ ਭਰ ਵਿਚ ਰਹਿ ਰਹੇ ਸਾਰੇ ਪੰਜਾਬੀਆਂ ਦੇ ਪਿਆਰ ਦੀ ਆਸ ਵਿਚ। http://www.punjab-in.org
    ਸੁਤਤੰਰ ਸਿੰਘ

  8. pooja
    अप्रैल 21, 2007 को 10:51 अपराह्न पर | #8

    i was looking 4 this poem 4 a long period…. thanx a lot 4 bringing it here…

  9. मार्च 13, 2008 को 8:33 अपराह्न पर | #9

    ਪੰਜਾਬੀ ਵੈਬ-ਸਾਈਟ ਪ੍ਰਕਾਸ਼ਿਤ ਕਰ ਲਈ ਹੈ। ਆਪ ਜੀ ਦੇ ਹੁੰਗਾਰੇ ਦੀ ਉਡੀਕ ਹੈ। ਵਿਸ਼ਵ ਭਰ ਵਿਚ ਰਹਿ ਰਹੇ ਸਾਰੇ ਪੰਜਾਬੀਆਂ ਦੇ ਪਿਆਰ ਦੀ ਆਸ ਵਿਚ। http://www.veerpunjab.com
    ਸੁਤਤੰਰ ਸਿੰਘ ਖੁਰਮੀ

  1. मई 18, 2007 को 3:00 अपराह्न पर | #1
  2. अगस्त 14, 2007 को 6:22 अपराह्न पर | #2
  3. मार्च 20, 2008 को 7:41 पूर्वाह्न पर | #3
  4. मार्च 20, 2008 को 7:47 पूर्वाह्न पर | #4

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Connecting to %s

Follow

Get every new post delivered to your Inbox.

%d bloggers like this: