आज बहुत दिनों बाद दिल्ली के चाँदनी चौक जाना हुआ। यहां आये बदलाव बहुत ही सहजता से इस बाजार में घुल मिल गये हैं। यहां नयी पहुंची मेट्रो के स्टेशन के बाहर भी वैसे ही भिखारी बैठे मिल जायेंगे जैसे पुरानी दिल्ली स्टेशन के बाहर मिलते हैं।

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यहां देखिये चाँदनी चौक में खुले मेक्डॉनल्ड्स की तस्वीर। सामने हैं सामान उठा कर चलने वाले जिन्हे यहां झल्लीवाले कहा जाता है और कान से मैल निकालते कनमैलिये। कनमैलिये और झल्लीवाले पुरानी दिल्ली की पहचान हैं और मेक्डॉनल्ड्स को आधुनिकता (?) की निशानी कह सकते हैं। अब यह आप ही बताइये कि परंपरा ने आधुनिकता को अपनाया है या आधुनिकता ने परंपरा को?



16 Responses to “चाँदनी चौक में मेक्डॉनल्ड”  

  1. यह तस्वीर बहुत कुछ कहती है ।
    धन्यवाद इसे हम तक पहुँचाने के लिये ।

    रीतेश गुप्ता

  2. नारी बीच सारी है कि सारी बीच नारी है.”मैकू दा ढाबा” नाम होता तो खूब फबता! :)

  3. भेलपुडी है, किसमे क्या है, कौन कह सकता है?

  4. अनुराग जी ने कहाः ”मैकू दा ढाबा”
    बस यही नाम काफ़ी है
    मेक्डॉनल्ड्स की वजह से क्या भारती लोग अपनी परंपरा भूल जाएं ;) :D

  5. दोनो ने दोनो को!

  6. वाह, यही तो हमारी संस्कृती की पहचान है कि सबका स्वागत है!! आकर देखिये, आप भी हमारी तरह हो जायेंगे या फिर भाग जायेंगे। :)

  7. अब यह आप ही बताइये कि परंपरा ने आधुनिकता को अपनाया है या आधुनिकता ने परंपरा को?

    दोनों ने एक दूसरे को अपनाया है, ना यह पूरी तरह से आधुनिक है और ना ही पूर्ण रूप से परंपरागत। :)

    वैसे ये बताईये कि वो द्वार के पास वाले बायीं ओर के खंबे के पास क्या हो रिया है?? ;)

  8. वैसे ये बताईये कि वो द्वार के पास वाले बायीं ओर के खंबे के पास क्या हो रिया है??

    अमित भाई, कुछ और न समझें, यह कान से मैल निकाली जा रही है :D

  9. वाह, परांठे वाली गली के बाजु में मैकु का ढाबा?

  10. अमित भाई, कुछ और न समझें, यह कान से मैल निकाली जा रही है

    अच्छा?? अब फ़ोटो थोड़ी धुंधली सी है ना तो मेरे को कुछ और ही लगा!! ;)

  11. हमारे शहर में रिक्शा वाले बड़े प्रेम से दिन का लंच मैक्डोल्ड में करते है।पूछने पर बोले- 20 रुपए में खाना निपट जाता है। अब आप ही बताए परम्परा और आधुनिकता अलग कहाँ है।

  12. हमारे शहर में रिक्शा वाले बड़े प्रेम से दिन का लंच मैक्डोल्ड में करते है।पूछने पर बोले- 20 रुपए में खाना निपट जाता है। अब आप ही बताएं परम्परा और आधुनिकता अलग कहाँ है।

  13. dono ne ek doosre ko!

  14. इस देश में कई-कई शताब्दियां एक साथ रहती हैं . तो नई और पुरानी दिल्ली की जुगलबंदी कैसे टूटेगी . कनमैलिये और मैक एक साथ रहेंगे इसमें.
    यही तो है शांतिपूर्ण सहअस्तित्व का सिद्धांत .

  15. वैसे भी हम हिंदुस्तानी आदि है एक ही भौगोलिक सीमा के भीतर कई-कई पहचानों के साथ जीने के लिए. हिंदुस्तान की इस गली में भी भारत के बगल में इंडिया पहुंच ही गया.

  16. zara yahaan jaiye, padhiye, aur phir, Rajdeep.sardesai@gmail.com par feedback bhejiye please..

    http://www.ibnlive.com/news/the-second-sardarni/27139-3.html

    ho sake to is ke baare mein apne blog par bhi likhiye.


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