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चाँदनी चौक में मेक्डॉनल्ड

आज बहुत दिनों बाद दिल्ली के चाँदनी चौक जाना हुआ। यहां आये बदलाव बहुत ही सहजता से इस बाजार में घुल मिल गये हैं। यहां नयी पहुंची मेट्रो के स्टेशन के बाहर भी वैसे ही भिखारी बैठे मिल जायेंगे जैसे पुरानी दिल्ली स्टेशन के बाहर मिलते हैं।

cc.JPG

यहां देखिये चाँदनी चौक में खुले मेक्डॉनल्ड्स की तस्वीर। सामने हैं सामान उठा कर चलने वाले जिन्हे यहां झल्लीवाले कहा जाता है और कान से मैल निकालते कनमैलिये। कनमैलिये और झल्लीवाले पुरानी दिल्ली की पहचान हैं और मेक्डॉनल्ड्स को आधुनिकता (?) की निशानी कह सकते हैं। अब यह आप ही बताइये कि परंपरा ने आधुनिकता को अपनाया है या आधुनिकता ने परंपरा को?

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  1. दिसम्बर 7, 2006 को 5:58 अपराह्न पर | #1

    यह तस्वीर बहुत कुछ कहती है ।
    धन्यवाद इसे हम तक पहुँचाने के लिये ।

    रीतेश गुप्ता

  2. दिसम्बर 7, 2006 को 5:59 अपराह्न पर | #2

    नारी बीच सारी है कि सारी बीच नारी है.”मैकू दा ढाबा” नाम होता तो खूब फबता! :)

  3. दिसम्बर 7, 2006 को 6:23 अपराह्न पर | #3

    भेलपुडी है, किसमे क्या है, कौन कह सकता है?

  4. दिसम्बर 7, 2006 को 7:06 अपराह्न पर | #4

    अनुराग जी ने कहाः ”मैकू दा ढाबा”
    बस यही नाम काफ़ी है
    मेक्डॉनल्ड्स की वजह से क्या भारती लोग अपनी परंपरा भूल जाएं ;) :D

  5. दिसम्बर 7, 2006 को 7:54 अपराह्न पर | #5

    दोनो ने दोनो को!

  6. दिसम्बर 7, 2006 को 7:57 अपराह्न पर | #6

    वाह, यही तो हमारी संस्कृती की पहचान है कि सबका स्वागत है!! आकर देखिये, आप भी हमारी तरह हो जायेंगे या फिर भाग जायेंगे। :)

  7. दिसम्बर 8, 2006 को 9:16 पूर्वाह्न पर | #7

    अब यह आप ही बताइये कि परंपरा ने आधुनिकता को अपनाया है या आधुनिकता ने परंपरा को?

    दोनों ने एक दूसरे को अपनाया है, ना यह पूरी तरह से आधुनिक है और ना ही पूर्ण रूप से परंपरागत। :)

    वैसे ये बताईये कि वो द्वार के पास वाले बायीं ओर के खंबे के पास क्या हो रिया है?? ;)

  8. दिसम्बर 8, 2006 को 9:23 पूर्वाह्न पर | #8

    वैसे ये बताईये कि वो द्वार के पास वाले बायीं ओर के खंबे के पास क्या हो रिया है??

    अमित भाई, कुछ और न समझें, यह कान से मैल निकाली जा रही है :D

  9. दिसम्बर 8, 2006 को 11:57 पूर्वाह्न पर | #9

    वाह, परांठे वाली गली के बाजु में मैकु का ढाबा?

  10. दिसम्बर 8, 2006 को 2:07 अपराह्न पर | #10

    अमित भाई, कुछ और न समझें, यह कान से मैल निकाली जा रही है

    अच्छा?? अब फ़ोटो थोड़ी धुंधली सी है ना तो मेरे को कुछ और ही लगा!! ;)

  11. दिसम्बर 8, 2006 को 9:27 अपराह्न पर | #11

    हमारे शहर में रिक्शा वाले बड़े प्रेम से दिन का लंच मैक्डोल्ड में करते है।पूछने पर बोले- 20 रुपए में खाना निपट जाता है। अब आप ही बताए परम्परा और आधुनिकता अलग कहाँ है।

  12. दिसम्बर 8, 2006 को 9:28 अपराह्न पर | #12

    हमारे शहर में रिक्शा वाले बड़े प्रेम से दिन का लंच मैक्डोल्ड में करते है।पूछने पर बोले- 20 रुपए में खाना निपट जाता है। अब आप ही बताएं परम्परा और आधुनिकता अलग कहाँ है।

  13. दिसम्बर 12, 2006 को 3:13 पूर्वाह्न पर | #13

    dono ne ek doosre ko!

  14. दिसम्बर 12, 2006 को 3:11 अपराह्न पर | #14

    इस देश में कई-कई शताब्दियां एक साथ रहती हैं . तो नई और पुरानी दिल्ली की जुगलबंदी कैसे टूटेगी . कनमैलिये और मैक एक साथ रहेंगे इसमें.
    यही तो है शांतिपूर्ण सहअस्तित्व का सिद्धांत .

  15. दिसम्बर 15, 2006 को 3:03 अपराह्न पर | #15

    वैसे भी हम हिंदुस्तानी आदि है एक ही भौगोलिक सीमा के भीतर कई-कई पहचानों के साथ जीने के लिए. हिंदुस्तान की इस गली में भी भारत के बगल में इंडिया पहुंच ही गया.

  16. दिसम्बर 18, 2006 को 4:07 पूर्वाह्न पर | #16

    zara yahaan jaiye, padhiye, aur phir, Rajdeep.sardesai@gmail.com par feedback bhejiye please..

    http://www.ibnlive.com/news/the-second-sardarni/27139-3.html

    ho sake to is ke baare mein apne blog par bhi likhiye.

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