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दिल्ली स्थित इस मॉल से कूद कर पिछले दिनों एक युवक ने आत्महत्या कर ली। कल जब यहां से गुजरा तो एक और युवक को छत के पास (काले घेरे में)खड़े पाया । घ्यान से देखा तो युवक सफाई कर रहा था।

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गुड़गांव स्थित नाव के आकार सा चांदी के रंग का यह भवन मुझे हमेशा से बहुत ही आकर्षित करता है। मगर गुड़गांव के इन भवनों के आसपास टूटी सड़कें, बिखरा कूड़ा और आवारा जानवर आराम से घूमते मिल जायेंगे। आज इस सुअर से बहुत मनुहार किया कि एक बार सिर ऊपर करके अच्छा सा पोज़ दे दे, मगर उसे केवल कूड़े में ही मजा आ रहा था, मेरे ब्लाग के लिये पोज़ देने में उसे जरा भी रुचि नहीं थी।


11 Responses to “विकास के यह रंग”  

  1. 1 समीर लाल

    आप उसे मंत्री पद का लालच दे देते तो जरुर सिर उठा लेता.

  2. 2 जगदीश भाटिया

    ठीक कहा समीर जी!
    और फिर अपने ही सचिव की हत्या करने वाले मंत्रियों से बेहतर मंत्री साबित हो सकता है ये बेचारा !

  3. 3 अनूप शुक्ला

    विकास के विरोधाभासी रंग बढ़िया हैं। हर सुन्दरता के साथ गंदगी नत्थी है लगता है!

  4. 4 संजय बेंगाणी

    किचड़ में कमल.

  5. 5 पंकज बेंग़ाणी

    मुझे तो चीन याद आता है

  6. 6 Amit

    जगदीश जी, नीचे वाली गुड़गाँव की तस्वीर की बात तो समझ आई लेकिन उपर सिटी स्क्वेयर मॉल की तस्वीर का अभिप्राय समझ नहीं आया। कृपया खुलासा करें। :)

  7. 7 Jagdish Bhatia

    “लेकिन उपर सिटी स्क्वेयर मॉल की तस्वीर का अभिप्राय समझ नहीं आया। कृपया खुलासा करें।”
    अमित जी, ऊपर वाले चित्र के बहुत से आयाम हो सकते हैं और देखने वाले की नजर पर भी निर्भर करता है।
    किसी को खूबसूरत मॉल नजर आयेगा तो किसी को कठिन परिस्थिती में सफाई करता युवक तो किसी के लिये विकास के इन मंदिरों (?) से कूदकर आत्महत्या का समाचार संवेदनशील हो सकता है :(

  8. 8 Amit

    अमित जी, ऊपर वाले चित्र के बहुत से आयाम हो सकते हैं और देखने वाले की नजर पर भी निर्भर करता है।

    हाँ वो तो है।

    किसी को खूबसूरत मॉल नजर आयेगा तो किसी को कठिन परिस्थिती में सफाई करता युवक तो किसी के लिये विकास के इन मंदिरों (?) से कूदकर आत्महत्या का समाचार संवेदनशील हो सकता है

    दरअसल मैं यह इसलिए पूछ रहा था कि नीचे वाले चित्र पर टिप्पणी तो व्यंग्य था लेकिन उपर वाले चित्र पर व्यंग्य समझ नहीं आया। क्योंकि यदि किसी इमारत से कूदकर कोई आत्महत्या करता है तो इसमें इमारत की क्या गलती?? ऊँची इमारतें इसलिए तो नहीं बनानी बंद कर सकते ना कि उनसे कूद लोग आत्महत्या करते हैं?? वास्तव में पूछो तो आत्महत्या करने वालों से मुझे सख़्त चिढ़ है, इसलिए उनके लिए तो मेरे मन में कोई सहानुभूति नहीं होती, लोगों को भी नहीं होनी चाहिए, सहानुभूति तो उनके घरवालों से होनी चाहिए।

  9. 9 जगदीश भाटिया

    “यदि किसी इमारत से कूदकर कोई आत्महत्या करता है तो इसमें इमारत की क्या गलती??”

    गलती तो अफ़ीम की भी नहीं होती मेरे दोस्त, गलती तो उस तालिबानी व्यवस्था की होती है जो उसके अंधाधुंध उत्पादन को बढ़ावा देती है….।

  10. 10 How Do We Khow

    शिव कुमार बटालवी पर विशेष बहुत ही उम्दा था! कुछ दिन इस दुनिया से दूर रहने से कितना कुछ छूट जाता है!! शिव कुमार बटालवी मेरे पसन्दीदा कवि रहे हैं

  1. 1 पीएम को एक सुअर की चिट्ठी « आईना