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“पता नहीं सरकिट……. !”

“हैलो सरकिट,”
“अरे मुन्नाभाई कैसे हो, अब तो तुम्हे बहुत टाईम हो गया चिट्ठा गिरी करते। क्या समाचार हैं चिट्ठा जगत के? “
“अरे कुछ मत पूछ सरकिट, इदर पानी और कोक को लेकर लफड़ा हो गया।”
“अरे क्या मुन्ना भाई ! पानी और कोक? अरे दारू पीने का और मस्त रहने का। क्या?”
“चुप्प ! दारू का नाम नहीं लेने का ! ये जगदीश भाटिया का ब्लाग है, अभी आ गया तो भोत पिटायी करेगा तेरी। वो तो क्या हुआ कि संजय भाई की एक टिप्पणी से अपने नीरज भाई की भावना को चोट लग गई।”
“भाई ये भावना जी कहां रहतीं है? “
“अरे रास्कल ! भावना बोले तो विचार ! फीलिंग ! नीरज भाई बोला कि गरीब के वास्ते साफ पानी, एजुकेशन और मेडिकल सर्विस के लिये सरकार को ज्यादा बजट देना चहिये।”
“तो भाई इसके लिये सरकार के पास और पैसा किदर से आयेंगा?”
“जब टाटा, बिड़ला और अंबानी और इनके जैसी हजारों कम्पनियां ज्यादा मुनाफा कमा कर ज्यादा टेक्स देंगी।”
“वो कैसे होगा भाई? “
“जब अधिक से अधिक लोग कोक पेप्सी पीयेंगे, रिलाईंस के मोबाईल खरीदेंगे। नये नये मॉल और एसईज़ेड बनेंगे। पता है सरकिट, इस बार मैं लाईब्रेरी में चाईना की इकोनॉमी स्टडी कर रहा था। वहां का एक एसईजेड ही इतना एक्सपोर्ट कर देता है जितना अक्खा इंडिया भी नहीं करता। और वहां खाली पड़ी बंजर जमीनों पर नये नये कई एसईजेड बन गये हैं जिनके आसपास कई नये शहर बस गये हैं और यह सब हुआ सिर्फ पिछले सात आठ सालों में। उनके एक बैंक की टर्नओवर हमारी अक्खी कंट्री की बैंकिंग ईंडस्ट्री से पांच गुना ज्यादी है। अपनी सरकार को भी कुछ ऐसाइच करना चाहिये।”
“इससे सबको साफ पानी मिल जायेंगा भाई?”
“यह तो मुझे पता नहीं मगर इतना जानता हूं कि सरकार अकेली किस किस को नौकरी देगी और किस किस की गरीबी दूर करेगी? रिलायंस के रिटेल आउटलेट्स अगर लोगों को नौकरी देते हैं तो क्यों न खुलें?”
“पर भाई हमारा कोई अपना सामाजिक इकोनॉमिक मॉडल भी तो होगा जो चाईना से अलग हो?”
“हां, हमारा है समाजवादी पूंजीवाद और उनका है पूंजीवादी समाजवाद !”
“है ! ! ! ! ! ! ! ! ! ! ! ! ! ! इसमें क्या फर्क है भाई?”
“पता नहीं सरकिट…….!”

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बिल्लूगिरी और विंडोस में लोचा
लगे रहो मुन्ना भाई

  1. नवम्बर 15, 2006 को 5:55 पूर्वाह्न पर | #1

    लगे रहो मुन्ना भाई!

  2. नवम्बर 15, 2006 को 6:06 पूर्वाह्न पर | #2

    “हां, हमारा है समाजवादी पूंजीवाद और उनका है पूंजीवादी समाजवाद !”

    –बहुते करारी चोट करते हो, भाई. मानते हैं आपका लोहा!!

    जारी रखो.

  3. नवम्बर 15, 2006 को 6:51 पूर्वाह्न पर | #3

    बहुत खराब लगा इसका अंत देखकर. कैसे इतनी अच्छी बात को इतनी जल्दी खत्म कर दिया. ऐसा करना अच्छा नहीं होता. इतने अच्छे अंदाज़ में लिखते हुये कुछ और आगे लिखा करें भाटियाजी. इतनी कंजूसी भी ठीक नहीं!

  4. नवम्बर 15, 2006 को 7:13 पूर्वाह्न पर | #4

    देखन मॉ छोटे लगैं – धाव करैं गम्भीर.

  5. नवम्बर 15, 2006 को 11:17 पूर्वाह्न पर | #5

    भाटिया जी, आपने बात खत्म नही की – अब आगे मुन्ना भाई का दिमाग इधर उधर भगाने कि बजाए इसी विषय को पूरा करें। चंद खास लेखों मे ये मेरा पसंदीदा लेख है……….

  6. नवम्बर 15, 2006 को 12:30 अपराह्न पर | #6

    इन तथा कथित समाजवादीयो ने ही देश को डूबा कर रखा है। इन्हे नही मालूम कि एक अंबानी कितने लोगो को रोजगार देता है।

  7. नवम्बर 15, 2006 को 2:08 अपराह्न पर | #7

    सर्किट : भाई बहुत लफ़ड़ा हो रिया है.

    मुन्ना भाई : का हुआ रे सर्किटवा ?

    सर्किट : ई चिट्ठा जगत में ‘विचार’ जी का ‘कामना’ जी से बाता-बाती अउर लफ़ड़ा हो गया है और ‘कामना’ बाई जी ने ‘भावना’ जी का भावना ठेसिया दिया है. ऊपर से ई ‘आईनवां’ हरकत दे रहा है .आगी में घी ठेल रहा है .

    मुन्ना भाई : ई मां हम का करें?

    सर्किट: अरे सबई बोला है फ़ैसला आपै करेंगे
    .
    मुन्नाभाई : बोलो का लफ़ड़ा है?

    सर्किट : कामना पार्टी बोल रहा है एसईज़ेड बनाए से देश का गड़िया बिकास का रास्ता पर भन्नाट दौड़बे करेगा . अउर ई बिचार-भावना पार्टी का लोक-जन आफ़त जोते है.

    मुन्नाभाई : ठीकै बोलता है कामना पार्टी वाला. अरे बुड़बक! अइसन कुछ होगा तबै न हम लोग कुछ पाएगा. पर ई नेतवा सब एसईज़ेड बनाएगा कहां ?

    सर्किट : क्या बोलता है भाई ! , अरे दिल्ली,मुम्बई,बेंगलूरु,कोलकाता में बनाएगा अउर कहां बनाएगा .

    मुन्ना भाई : तब तो जरूर दिल्ली में कनाटप्लेस,मुम्बई में बलार्ड एस्टेट,बेंगलूरु में एम.जी.रोड अउर कोलकाता में धरमतल्ला में बनबे करेगा ‘एसईज़ेड’ .

    सर्किट: का बोलते हो गुरू! उहां कइसे बनेगा . उहां तो सब बड़का लोग-जन रहता है. ऊ बनेगा सब ‘सहर’ का बाहर किसान-उसान का जमीन पर. ई ससुरा किसान-उसान लोग एतना जमीन घेर कर का तो सब करता है.

    मुन्नाभाई : अरे बुड़बक! ई किसान-उसान का जमीन ले लेंगे तो गेहूं-चावल कहां से मिलबे करेगा?

    सर्किट : हम जानत रहे आप ई बेकार का सवाल जरूर पूछबे करेंगे . अरे ई ससुरा एतना बड़ा-बड़ा मॉल जो बना है कौने दिन काम में आवेगा. ओहीं से आएगा गेहूं-चावल.

    मुन्नाभाई : जुग-जुग जियो बेटा खूब तरक्की किये हो. जाओ, अब तुम अपना अलग पार्टी बनाओ. अउर भाई का नाम रौशन करो. एतना ज्ञानी अब हमार पार्टी में नाहीं चलेगा.

  8. नवम्बर 15, 2006 को 3:01 अपराह्न पर | #8

    वाह , जैसा करारा लेख वैसी ही करारी टिप्पणी ,प्रियंकर की ।

  9. नवम्बर 15, 2006 को 3:39 अपराह्न पर | #9

    भाटीयाजी बहुत अच्छा लिखा है.
    शायद चीन में अब खेती के लिए जगह नहीं बची हैं तथा वे मॉल से धान खरीद रहे हैं.

  10. नवम्बर 15, 2006 को 5:46 अपराह्न पर | #10

    मुन्नाभाई : एतना दिन कहां रहा रे सर्किटवा?

    सर्किट : भाई! हम चाइना का ‘इकनॉमिक स्टडी’ करत रहे.

    मुन्नाभाई : हम जानत रहे तुम कौनो गलत धंधा मा पड़ गये हो.

    सर्किट : का बोलते हैं भाई! धंधा की कसम एहमा भारी धंधा की गुंजाइश है.

    मुन्नाभाई : साफ़-साफ़ बोल का बात है.

    सर्किट : चाइना ‘एसईज़ेड’ बनाया है,ऊका एक ‘एसईज़ेड’ का एक्सपोर्ट हमरे अक्खा देश के एक्सपोर्ट से बेसी है.

    मुन्नाभाई : का बोलता है रे! ई ससुरा चीनी-सक्कर कहां बनाया है ऊ ‘एसईज़ेड’ अउर का एक्स्पोर्ट करता है.

    सर्किट : गुरू ऊ सब ‘एसईज़ेड’ बनाया है बंजर ज़मीन पर अउर उहां नया बस्ती बसा दिया . ऊ इलेक्ट्रोनिक्स गुड्स अउर ‘माइक्रोचिप्स’ एक्सपोर्ट करता है.

    मुन्नाभाई : तब हमरे देश में ई सब सरकारी अमला किसानन का उपजाऊ जमीन काहे छीनता है. अउर ई मल्टीनेशनल फ़ूड प्रोसेसिंग मा काहे घुसता है? ससुरा उहां बनाएगा ‘माइक्रोचिप्स’ अउर हमरे इहां बनाएगा ‘पोटैटो चिप्स’. दू रुपया किलो का आलू दू सौ मा बेचबे करेगा . बुड़बक समझा है क्या ?

    सर्किट : ना ऊ आपन मरजी से ना न करत हैं. आपन सरकार का परमीशन होई.

    मुन्ना भाई : हमरा भी ईमान है , पर ई ससुरी सरकार का भी कौनौ धरम-ईमान नाहीं .

    सर्किट : सच बोलते हो भाई बहुत बुरा समय है, सब जन बोल रहा है.कोई ई मोबाइल से बोलता है कोई ऊ मोबाइल से बोलता है. खाते-पीते , हगते-मूतते भी चैन नाहीं सब बोले ही जा रहा है.

    मुन्नाभाई : सो तो दिख रहा है . सब साला ‘टॉक टाइम’ खलास कर रहा है.पर कौनौ सुनता भी है ?

    सर्किट : भाई लाख टके की एक बात बोलेगा . परमीशन है?

    मुन्नाभाई : बोल सर्किटवा ज्यास्ती भाव मत खा .

    सर्किट : हिंदी का एक ‘मसहूर’ कवि लिखे हैं :

    ” बोल तो बहुत लिये, अब कुछ कहो भी ”

    मुन्नाभाई : वाह का बात बोला है रे सर्किटवा सब साला बोल रहा है अउर कहता कुच्छौ नहीं. सब साला बोल रहा है अउर सुनता कौनौ नहीं . केतना अज़ब समय है. डर लागत है

  11. नवम्बर 16, 2006 को 4:06 पूर्वाह्न पर | #11

    वाह क्या लेख और उस पर बेजोड़ टिप्पणी।

  12. नवम्बर 17, 2006 को 6:22 अपराह्न पर | #12

    अउ अपन ससुरा अगर कुछ कहे तो लोगवा पूछत हैं कि करते काहे नहीं.
    यानी अब जो कुछ अपन कर रहे हैं उसका ढिंढोरा भी पीटें. :) .. चलो जल्द ही पीटेंगे ढिंढोरी.

    चाइनीज़ मॉडल में भैया संभावनाएं दिखाई दे रही हैं.. राजनीतिक मॉडल में हिकारत? यानी मीठा मीठा गप गप और कड़वा कड़वा थूक. वैसे भाई आपने एक लफ़्ज़ बड़े काम का कहा है.. ”बंजर ज़मीन” पर एसईज़ेड. अब यहां का मॉडल देखो और ज़मीनें देखो दादा. किसान काहे पंगा लिए बैठे हैं जब बंजर ज़मीन ही जा रही है. कुछ गड़बड़ नहीं दिख रहा है भाई?

  1. दिसम्बर 28, 2006 को 7:46 अपराह्न पर | #1
  2. दिसम्बर 31, 2006 को 10:33 पूर्वाह्न पर | #2
  3. अप्रैल 11, 2007 को 9:09 अपराह्न पर | #3
  4. दिसम्बर 18, 2007 को 7:53 अपराह्न पर | #4

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