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तुम मुझे जन्म तो लेने देते

हो सकता है जज बन जाती

देती हजारों को मैं न्याय

बन पुलिस ऑफिसर पापा

कितनों को दिखलाती राह

डाक्टर बन देखते पापा

कितनों की बचाती जान

ओलंपिक में जा देश के

पूरे करती सब अरमां

गर बन जाती कल्पना चावला

जग में करती तुम्हारा भी नाम

पापा !!

तुम मुझे जन्म तो लेने देते !!!!!

(कल रक्षाबंधन के दिन समाचार मिला कि पटियाला के एक नर्सिंगहोम के पीछे कूंएं में 35 कन्या भ्रूण फेंक दिये गये।)

  1. अगस्त 10, 2006 को 12:50 अपराह्न पर | #1

    :-C

  2. अगस्त 10, 2006 को 2:31 अपराह्न पर | #2

    सटीक कविता । यहाँ भी देखें

  3. अगस्त 10, 2006 को 3:52 अपराह्न पर | #3

    मार्मिक कविता है. ऐसी कविताएं पढ़कर दिल पसीज उठता है. कन्याभ्रूण हत्या की घनघोर निंदा और भर्त्सना की जानी चाहिए.. जगदीश भैया को कविता के लिए धन्यवाद

  4. अगस्त 10, 2006 को 4:36 अपराह्न पर | #4

    nicely written.

  5. अगस्त 10, 2006 को 4:58 अपराह्न पर | #5

    मन के भाव व्यक्त करने के लिये शब्द नहीं मिल रहे।

  6. अगस्त 10, 2006 को 5:19 अपराह्न पर | #6

    अति मार्मिक.

  7. अगस्त 11, 2006 को 6:34 पूर्वाह्न पर | #7

    इस तरह के समाचार पढ़ कर बहुत दु:ख होता हैं। नाइंसाफी उन के साथ जो अपने डिफ़ेन्स में कुछ नहीं कर सकते।

    जगदीश जी, कविता बहुत हृदयस्पर्शी हैं…

  8. अगस्त 11, 2006 को 6:02 अपराह्न पर | #8

    बहुत बढिया है – इस पर कुछ लिखने के लिए मेरे पास अलफाज़ नही

  9. अगस्त 11, 2006 को 10:11 अपराह्न पर | #9

    बदिया कविता है..मेरी एक कविता मे मेने लिखा हे
    “बेट्ए का जब जब जन्म हुआ हर घर मे खुशिया लहराइ.
    बेती का बभ्रुण परीक्श्ण कर कोख मे हत्या करवाइ.
    इतना जानो नारी से ही इस दुनिया मे रोनक आइ
    नारी जो गुम हुइ जग से तो मानो की शामत आइ”
    ashuddh lekhan ke liye kshama kare..abhi seekh rahi hu..

  10. अगस्त 16, 2006 को 2:20 अपराह्न पर | #10

    मैने ये लेख पढा था. क़िंतु मुझे इसे पढ कर क़ोइ नयी घृणा नही हुई. किस बात से घृणा करू? 35 शव थे? न मालूम कितने रोज़ होते है! हुम संभ्रांत लोग तब कहाँ होते हैं? इस बात से कि वे पाये गये? इस में तो उस डॉक्टर दंपत्ती का दुर्भाग्य ही है! नही तो कितने रोज़ निकल जाते हैं! ये बताइये कि आप और हुम जैसे लोग रोज़ ऐसा क्य करते हैं कि हमे इस त्रासदी पर शिकायत या दुख का अधिकार हो?

  11. अगस्त 16, 2006 को 2:35 अपराह्न पर | #11

    मैं आपके गुस्से को समझता हूं बुल्ले शाह, यह सब हमारे ही घरों महल्लों और शहरों में होता होगा, चुपचाप। मगर अपने अपने हिस्से का विरोध सब को जताना चाहिये।

  12. अगस्त 28, 2006 को 5:16 अपराह्न पर | #12

    बहुत खूब सरजी..
    आपकी येह lines मैं और लोगों को भी पढाना चाहता हूं..

    लिखते रहें..

  13. दिसम्बर 29, 2006 को 11:16 पूर्वाह्न पर | #13

    कोख में कब्र दे दी उस नन्हे फूल को
    जब नाम बेटी का था उस से जुड़ा……
    किस से करती वोह फ़रियाद अपनी
    जब बाग़ का माली ही था उसको उजाड़ने पैर तुला

    ranju …….

    इस विशए पर और बहुत लिखने की अभी जरूरत है

    शायद तभी कुछ चेतना आ सके मेने भी इस पर लिखने की कई बार कोशिश की है

    आपका पर्यास सरहानीय है ..शुक्रिया

  14. जून 8, 2007 को 1:47 अपराह्न पर | #14

    bahut sundar

  15. Amit Garg
    मार्च 11, 2008 को 2:14 अपराह्न पर | #15

    bahut acha likha hian dost

  16. Amit Garg
    मार्च 11, 2008 को 2:14 अपराह्न पर | #16

    bahut acha likha hian dost..

  1. अगस्त 10, 2006 को 7:48 अपराह्न पर | #1

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