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	<title>Comments on: कृष्णा टु सुदामा &#8220;थैंक्यू बड्डी, वैरी टेस्टी सत्तू&#8221;-२</title>
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	<description>आईना देख कर तस्सली हुई, हमको इस घर में जानता है कोई..........! - गुलजार</description>
	<pubDate>Thu, 22 May 2008 00:06:19 +0000</pubDate>
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		<title>By: आईना कृष्णा टु सुदामा &#8220;थैंक्यू बड्डी, वैरी टेस्टी सत्तू&#8221; &#171;</title>
		<link>http://aaina2.wordpress.com/2006/06/28/krishna/#comment-1287</link>
		<dc:creator>आईना कृष्णा टु सुदामा &#8220;थैंक्यू बड्डी, वैरी टेस्टी सत्तू&#8221; &#171;</dc:creator>
		<pubDate>Mon, 01 Jan 2007 17:46:52 +0000</pubDate>
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		<description>[...] बहुत पसंद किये गये “पता नहीं सरकिट……. !”  चुनने को है क्या? मूषकर जी का इंटरव्यू ओ हरामजादे बिल्लूगिरी और विंडोस में लोचा  माया मिली न राम- शब्दशः  दिल में वंदेमातरम दिमाग में तेलगी लगे रहो मुन्ना भाई मेरा मन धक से रह जाता है…….  तुम मुझे जन्म तो लेने देते कृष्णा टु सुदामा “थैंक्यू बड्डी, वैरी टेस्टी सत्तू”-२ दस रुपये दो न माँ [...]</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>[...] बहुत पसंद किये गये “पता नहीं सरकिट……. !”  चुनने को है क्या? मूषकर जी का इंटरव्यू ओ हरामजादे बिल्लूगिरी और विंडोस में लोचा  माया मिली न राम- शब्दशः  दिल में वंदेमातरम दिमाग में तेलगी लगे रहो मुन्ना भाई मेरा मन धक से रह जाता है…….  तुम मुझे जन्म तो लेने देते कृष्णा टु सुदामा “थैंक्यू बड्डी, वैरी टेस्टी सत्तू”-२ दस रुपये दो न माँ [...]</p>
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	</item>
	<item>
		<title>By: मैं, नीरज दीवान और पुस्तक मेला - भई वाह &#171; आईना</title>
		<link>http://aaina2.wordpress.com/2006/06/28/krishna/#comment-553</link>
		<dc:creator>मैं, नीरज दीवान और पुस्तक मेला - भई वाह &#171; आईना</dc:creator>
		<pubDate>Sun, 17 Sep 2006 16:31:45 +0000</pubDate>
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		<description>[...] दिल्ली का प्रगति मैदान कई वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला है और इस प्रकार के मेलों के लिय बहुत ही बेहतरीन जगह है। हर वर्ष यहां नवंबर में अंतराष्ट्रीय व्यापार मेला लगता है। इस&#160;बार नवंबर से पहले ही यहां मेट्रो&#160;भी जाने लगेगी। बड़े बड़े वातानुकूलित हॉल&#160;और अंदर सैंकड़ों प्रकाशकों की हजारों लाखों किताबें। &#160;देश भर के प्रकाशकों के सभी बड़े बड़े नाम उपस्थित थे। हिंदी साहित्य, विज्ञान, बाल साहित्य, अंग्रेजी उपन्यास, प्रतियोगी परिक्षाओं की तैयारी के लिये पुस्तकें, धार्मिक, प्रबंधन, योग, ओशो और&#160;जीवन में सफलता दिलाने वाली पुस्तकें। यूं लगा कि ज्ञान के मंदिर में ही पंहुच गये। तीन घंटे तक पुस्तकों के सागर में गोते लगाते रहे और अपनी समझ से कुछ मोती भी अपने अपने लिये चुन लिये। मुझे याद था एक बार मेरे एक पोस्ट &#8220;कृष्णा टु सुदामा “थैंक्यू बड्डी, वैरी टेस्टी सत्तू”-२&#8221; पर&#160;रमन कौल जी ने इच्छा जताई&#160;थी कि &#160;भीष्म साहनी की&#160; कहानी&#160; “ओ हरामज़ादे” अगर किसी को मिले तो नेट पर डाल दे।&#160; &#160;वह किताब भी राजकमल प्रकाशन के स्टाल पर मिल गई और मैंने फट खरीद ली। तो अगर आपको यह कहनी पढ़नी है तो मेरी अगली पोस्ट का इंतजार करें। [...]</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>[...] दिल्ली का प्रगति मैदान कई वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला है और इस प्रकार के मेलों के लिय बहुत ही बेहतरीन जगह है। हर वर्ष यहां नवंबर में अंतराष्ट्रीय व्यापार मेला लगता है। इस&nbsp;बार नवंबर से पहले ही यहां मेट्रो&nbsp;भी जाने लगेगी। बड़े बड़े वातानुकूलित हॉल&nbsp;और अंदर सैंकड़ों प्रकाशकों की हजारों लाखों किताबें। &nbsp;देश भर के प्रकाशकों के सभी बड़े बड़े नाम उपस्थित थे। हिंदी साहित्य, विज्ञान, बाल साहित्य, अंग्रेजी उपन्यास, प्रतियोगी परिक्षाओं की तैयारी के लिये पुस्तकें, धार्मिक, प्रबंधन, योग, ओशो और&nbsp;जीवन में सफलता दिलाने वाली पुस्तकें। यूं लगा कि ज्ञान के मंदिर में ही पंहुच गये। तीन घंटे तक पुस्तकों के सागर में गोते लगाते रहे और अपनी समझ से कुछ मोती भी अपने अपने लिये चुन लिये। मुझे याद था एक बार मेरे एक पोस्ट &#8220;कृष्णा टु सुदामा “थैंक्यू बड्डी, वैरी टेस्टी सत्तू”-२&#8221; पर&nbsp;रमन कौल जी ने इच्छा जताई&nbsp;थी कि &nbsp;भीष्म साहनी की&nbsp; कहानी&nbsp; “ओ हरामज़ादे” अगर किसी को मिले तो नेट पर डाल दे।&nbsp; &nbsp;वह किताब भी राजकमल प्रकाशन के स्टाल पर मिल गई और मैंने फट खरीद ली। तो अगर आपको यह कहनी पढ़नी है तो मेरी अगली पोस्ट का इंतजार करें। [...]</p>
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	<item>
		<title>By: How do we know</title>
		<link>http://aaina2.wordpress.com/2006/06/28/krishna/#comment-94</link>
		<dc:creator>How do we know</dc:creator>
		<pubDate>Fri, 07 Jul 2006 01:55:00 +0000</pubDate>
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		<description>perfect!</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>perfect!</p>
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		<title>By: SHUAIB</title>
		<link>http://aaina2.wordpress.com/2006/06/28/krishna/#comment-93</link>
		<dc:creator>SHUAIB</dc:creator>
		<pubDate>Fri, 30 Jun 2006 21:27:00 +0000</pubDate>
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		<description>आपने जो भी लिखा बिलकुल सही लिखा है।
देर से टिप्पणी लिखने के लिए Sorry।
वैसे भी यहां के नेट केफे मे हिन्दी मे टिप्पणि लिखना बहुत मुशकिल है।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>आपने जो भी लिखा बिलकुल सही लिखा है।<br />
देर से टिप्पणी लिखने के लिए Sorry।<br />
वैसे भी यहां के नेट केफे मे हिन्दी मे टिप्पणि लिखना बहुत मुशकिल है।</p>
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		<title>By: Amit</title>
		<link>http://aaina2.wordpress.com/2006/06/28/krishna/#comment-92</link>
		<dc:creator>Amit</dc:creator>
		<pubDate>Fri, 30 Jun 2006 17:11:00 +0000</pubDate>
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		<description>&lt;I&gt;अमित जी, आपकी टिप्पणी जहां थी और जैसे थी वहीं है, मैंने उससे कोई छेड़छाड़ नहीं की है। मैंने अपनी पिछली पोस्ट में जो कुछ कहा उसी को अधिक स्पष्ट करने की यहां कोशिश की है। क्षमा करें यदि मैं अपनी बात आप को समझा नहीं पाया।&lt;/I&gt;

अरे क्षमा माँग काहे शर्मिन्दा कर रहें हैं जगदीश जी। मेरे कहने का अर्थ था कि आपने अपनी पोस्ट में मेरी टिप्पणी का एक भाग छाप उस पर अपने विचार व्यक्त किए, लेकिन उस एक भाग से मेरी टिप्पणी का पूर्ण सार नहीं आता, लोगों पर एक गलत अर्थ प्रक्षेपित हो सकता है, इसलिए मैंने कहा कि पूरी टिप्पणी छापते(या उसका लिंक दे देते) और फ़िर उस पर अपने विचार व्यक्त करते तो मामला फ़िट बैठता। :D खैर कोई नहीं, मैंने अपनी टिप्पणियों के लिंक दे ही दिए हैं, जिसको जो समझना है समझता रहेगा!! ;)</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p><i>अमित जी, आपकी टिप्पणी जहां थी और जैसे थी वहीं है, मैंने उससे कोई छेड़छाड़ नहीं की है। मैंने अपनी पिछली पोस्ट में जो कुछ कहा उसी को अधिक स्पष्ट करने की यहां कोशिश की है। क्षमा करें यदि मैं अपनी बात आप को समझा नहीं पाया।</i></p>
<p>अरे क्षमा माँग काहे शर्मिन्दा कर रहें हैं जगदीश जी। मेरे कहने का अर्थ था कि आपने अपनी पोस्ट में मेरी टिप्पणी का एक भाग छाप उस पर अपने विचार व्यक्त किए, लेकिन उस एक भाग से मेरी टिप्पणी का पूर्ण सार नहीं आता, लोगों पर एक गलत अर्थ प्रक्षेपित हो सकता है, इसलिए मैंने कहा कि पूरी टिप्पणी छापते(या उसका लिंक दे देते) और फ़िर उस पर अपने विचार व्यक्त करते तो मामला फ़िट बैठता। <img src='http://s.wordpress.com/wp-includes/images/smilies/icon_biggrin.gif' alt=':D' class='wp-smiley' /> खैर कोई नहीं, मैंने अपनी टिप्पणियों के लिंक दे ही दिए हैं, जिसको जो समझना है समझता रहेगा!! <img src='http://s.wordpress.com/wp-includes/images/smilies/icon_wink.gif' alt=';)' class='wp-smiley' /></p>
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	</item>
	<item>
		<title>By: Jagdish Bhatia</title>
		<link>http://aaina2.wordpress.com/2006/06/28/krishna/#comment-91</link>
		<dc:creator>Jagdish Bhatia</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 29 Jun 2006 16:01:00 +0000</pubDate>
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		<description>नीरज जी, 
मेरी भावना को समझने के लिये धन्यवाद।
रमणजी, 
धन्यवाद, भीष्म साहनी  की यह कहानी कभी मिली तो जरूर पोस्ट करूंगा।
छाया जी धन्यावाद, खेद की बात तो यह है कि कई भारतीय भी हमारी इस भारतीयता को नहीं समझते।

रत्ना जी, धन्यवाद, समाज के इस मर्म को समझने  के लिये।
तरुण जी धन्यवाद।

अमित जी, आपकी टिप्पणी जहां थी और जैसे थी वहीं है, मैंने उससे कोई छेड़छाड़ नहीं की है। मैंने अपनी पिछली पोस्ट में जो कुछ कहा उसी को अधिक  स्पष्ट करने की यहां कोशिश की है। क्षमा करें यदि मैं अपनी बात आप को समझा नहीं पाया। धन्यवाद।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>नीरज जी,<br />
मेरी भावना को समझने के लिये धन्यवाद।<br />
रमणजी,<br />
धन्यवाद, भीष्म साहनी  की यह कहानी कभी मिली तो जरूर पोस्ट करूंगा।<br />
छाया जी धन्यावाद, खेद की बात तो यह है कि कई भारतीय भी हमारी इस भारतीयता को नहीं समझते।</p>
<p>रत्ना जी, धन्यवाद, समाज के इस मर्म को समझने  के लिये।<br />
तरुण जी धन्यवाद।</p>
<p>अमित जी, आपकी टिप्पणी जहां थी और जैसे थी वहीं है, मैंने उससे कोई छेड़छाड़ नहीं की है। मैंने अपनी पिछली पोस्ट में जो कुछ कहा उसी को अधिक  स्पष्ट करने की यहां कोशिश की है। क्षमा करें यदि मैं अपनी बात आप को समझा नहीं पाया। धन्यवाद।</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: Amit</title>
		<link>http://aaina2.wordpress.com/2006/06/28/krishna/#comment-90</link>
		<dc:creator>Amit</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 29 Jun 2006 14:29:00 +0000</pubDate>
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		<description>जगदीश जी, टिप्पणी देनी थी तो पूरी कि पूरी छापते, काहे आधी अधूरी छाप कर अर्थ का अनर्थ किए दे रहे हैं? ;)

मेरी टिप्पणियाँ यहाँ पढ़ें - &lt;a HREF="http://aaina1.blogspot.com/2006/06/blog-post_27.html#c115141942138749062" rel="nofollow"&gt;1&lt;/A&gt;, &lt;a HREF="http://aaina1.blogspot.com/2006/06/blog-post_27.html#c115147790314432749" rel="nofollow"&gt;2&lt;/A&gt;, &lt;a HREF="http://www.blogger.com/profile/2930564" rel="nofollow"&gt;3&lt;/A&gt;

मैं यह पहले ही कह चुका हूँ कि रीडर्स डाईजेस्ट वाले सर्वे पर खाक डालो, लेकिन जो विषय है आभार तथा खेद प्रकट करने का, उस पर बात करनी चाहिए।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>जगदीश जी, टिप्पणी देनी थी तो पूरी कि पूरी छापते, काहे आधी अधूरी छाप कर अर्थ का अनर्थ किए दे रहे हैं? <img src='http://s.wordpress.com/wp-includes/images/smilies/icon_wink.gif' alt=';)' class='wp-smiley' /><br />
मेरी टिप्पणियाँ यहाँ पढ़ें - <a HREF="http://aaina1.blogspot.com/2006/06/blog-post_27.html#c115141942138749062" rel="nofollow">1</a>, <a HREF="http://aaina1.blogspot.com/2006/06/blog-post_27.html#c115147790314432749" rel="nofollow">2</a>, <a HREF="http://www.blogger.com/profile/2930564" rel="nofollow">3</a></p>
<p>मैं यह पहले ही कह चुका हूँ कि रीडर्स डाईजेस्ट वाले सर्वे पर खाक डालो, लेकिन जो विषय है आभार तथा खेद प्रकट करने का, उस पर बात करनी चाहिए।</p>
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	<item>
		<title>By: Tarun</title>
		<link>http://aaina2.wordpress.com/2006/06/28/krishna/#comment-89</link>
		<dc:creator>Tarun</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 29 Jun 2006 06:11:00 +0000</pubDate>
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		<description>बस की सीट पर अपने साथ घटी भी सुना लेता हूँ, दिल वालों की दिल्ली की बात है। नया नया आया था दिल्ली का पानी अभी पिया नही था। गलती से 'कृप्या महिलाओं और बुजुर्गों के लिये सीट छोड़ें' का पालन कर बैठा। एक महिला (लड़की कहना ज्यादा उचित होगा शायद) अपने बाजू में खड़ी हुई तो मैने अपनी सीट छोड़ दी। थैंक्यू नही बोला उसका कुछ मलाल नही हुआ लेकिन मैडम दो वाली सीट में से एक सीट के आधे में खुद बैठी आधे में अपने लड़के दोस्त को बैठा दिया। बात यहाँ खत्म नही हुई, दूसरी सीट में बैठे जनाब ३-४ स्टेशन बाद उतर गये। उसके बाद वो दोनों जने पसर के बैठ गये अपने को पूछना तो दूर अपने साथ खड़ी एक बुजुर्ग महिला तक को नही पूछा। लेकिन हम को आगे के लिये सबक दे गये।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>बस की सीट पर अपने साथ घटी भी सुना लेता हूँ, दिल वालों की दिल्ली की बात है। नया नया आया था दिल्ली का पानी अभी पिया नही था। गलती से &#8216;कृप्या महिलाओं और बुजुर्गों के लिये सीट छोड़ें&#8217; का पालन कर बैठा। एक महिला (लड़की कहना ज्यादा उचित होगा शायद) अपने बाजू में खड़ी हुई तो मैने अपनी सीट छोड़ दी। थैंक्यू नही बोला उसका कुछ मलाल नही हुआ लेकिन मैडम दो वाली सीट में से एक सीट के आधे में खुद बैठी आधे में अपने लड़के दोस्त को बैठा दिया। बात यहाँ खत्म नही हुई, दूसरी सीट में बैठे जनाब ३-४ स्टेशन बाद उतर गये। उसके बाद वो दोनों जने पसर के बैठ गये अपने को पूछना तो दूर अपने साथ खड़ी एक बुजुर्ग महिला तक को नही पूछा। लेकिन हम को आगे के लिये सबक दे गये।</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: ratna</title>
		<link>http://aaina2.wordpress.com/2006/06/28/krishna/#comment-88</link>
		<dc:creator>ratna</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 29 Jun 2006 00:13:00 +0000</pubDate>
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		<description>Thankyou आपने इतना अच्छा किस्सा सुनाया । Sorry पिछली पोस्ट पर टिप्पणी नहीं दी । हमारे समाज में इन दोनों शब्दों का सरेआम प्रय़ोग कितना अजीब लगता है ।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>Thankyou आपने इतना अच्छा किस्सा सुनाया । Sorry पिछली पोस्ट पर टिप्पणी नहीं दी । हमारे समाज में इन दोनों शब्दों का सरेआम प्रय़ोग कितना अजीब लगता है ।</p>
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	<item>
		<title>By: e-shadow</title>
		<link>http://aaina2.wordpress.com/2006/06/28/krishna/#comment-87</link>
		<dc:creator>e-shadow</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 29 Jun 2006 00:11:00 +0000</pubDate>
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		<description>बहुत सही, वैसे विदेश में बगल वाले के अखबार में झाँकना भी असभ्यता मानी जायेगी, प्रश्न पूछना तो दूर। तो हर समाज के अपने अपने कायदे कानून होते हैं साहब। रमण जी, बहुत अच्छी कहानी की याद दिलाई आपने, "ओ हरामजादे" की फरमाइश मै भी करूंगा आपके साथ। अल्लाह के नाम पर दे दे बाबा, जो देगा उसका भी भला, जो ना दे उसका भी भला।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>बहुत सही, वैसे विदेश में बगल वाले के अखबार में झाँकना भी असभ्यता मानी जायेगी, प्रश्न पूछना तो दूर। तो हर समाज के अपने अपने कायदे कानून होते हैं साहब। रमण जी, बहुत अच्छी कहानी की याद दिलाई आपने, &#8220;ओ हरामजादे&#8221; की फरमाइश मै भी करूंगा आपके साथ। अल्लाह के नाम पर दे दे बाबा, जो देगा उसका भी भला, जो ना दे उसका भी भला।</p>
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