आज नवभारतटाईम्स के दिल्ली संस्करण के कुछ समाचार:
(यह तो मात्र एक उदाहरण है, आप किसी भी दिन का अंक देखिए, समाचार ऎसे ही मिलेंगे)
१.डीयू के स्कूल ऑफ़ ओपन लर्निंग में प्रफ़ेशनल कोर्स नहीं
२. एडमिशन फ़ॉर्म जमा कराने 10 हजार स्टूडेंट्स पहुंचे
३. डीयू में पीजी लेवल के 4 नए फार्मा कोर्स
४. कड़कड़डूमा में पार्किंग की टेंशन होगी खत्म
५.नोएडा में बिना एनओसी के चल रही है इंडस्ट्रीज
६. बढ़ रहा है नए फ़ीचर वाले मोबाईलों का क्रेज
संपादकीय भी एसी ही भाषा में है, पूरा संपादकीय न दे कर इंगलिश के प्रयुक्त शब्द यहां दे रहा हू:
पब्लिक, पॉलिटिक्स, सेंट्रल गवर्नमेंट, फेवर, परसेंट, सेक्टर, डिक्लेयर्ड, विलेन, डायबटीज।
बहुत पसंद किये गये
“पता नहीं सरकिट……. !”
चुनने को है क्या?
मूषकर जी का इंटरव्यू
ओ हरामजादे
बिल्लूगिरी और विंडोस में लोचा
माया मिली न राम- शब्दशः
दिल में वंदेमातरम दिमाग में तेलगी
लगे रहो मुन्ना भाई
मेरा मन धक से रह जाता है…….
तुम मुझे जन्म तो लेने देते
कृष्णा टु सुदामा “थैंक्यू बड्डी, वैरी टेस्टी सत्तू”-२
दस रुपये दो न माँ









आपने भी सबसे पहले खास खास खबरों पर नज़र डाली है
वाह साहेब वाह, आपने क्या खूब पकडा है। समझ नही आता यह हिन्दी का अंग्रेजीकरण या अंग्रेजी का हिन्दीकरण या कोई नई ही भाषा है।
दिस इस ए वेरि नैस पोस्ट (!)!!!
खैर जो भी है, अनएडल्टरेटिड इन्ग्लिश से तो अछ्छी है. यदि समय के साथ नहीं बदले, और आम बोलचाल की भाशा को अडौप्ट नहीं किया तो बची खुची कसर भी हाथ से निकल जायेगी.
मुकुल.
“आम बोलचाल की भाशा को अडौप्ट नहीं किया तो बची खुची कसर भी हाथ से निकल जायेगी.”
यानी हमारी भाषा को बचाने का ठेका ऐसे समाचारपत्रो ने ले रखा हैं?
यह प्रतिबध्ता कि गिरावट मात्र हैं, जो हिन्दी का सत्यानाश करेगी.
चिंताजनक स्थिति है. ख़ासकर नवभारत टाइम्स में इसी तरह की वर्तनी को वरीयता दी जाती रही है. यह टाइम्स का असर है. दिल्लीवालों में इसी तरह की हिन्दी प्रचलित है और अख़बारवालों की नज़रे उसी वर्ग पर है जो इन दिनों शहर में हॉट-हॉट अनुभव कर रहा है. चलिए हम लोग हरसंभव कोशिश करेंगे कि हिन्दुस्तानी का इस्तेमाल करेंगे.
अगर समाज में ऎसी भाषा प्रयोग की जाती है तो क्या यह बाजार की भी मांग बन जाती है? क्या समाचार पत्रों का कोई सामाजिक दायित्व नहीं है?