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अनुगूँज 20: नेतागिरी, राजनीति और नेता

Akshargram Anugunj

नेता बनने का मुझे भी शॊंक चढ़ रहा था। मैने शुद्ध गाँधीवादी तरीका अपनाया देश और समाज की सेवा करने का। मैंने सोचा अपनी गली से ही शुरू करना चहिए। गली का सफ़ाई कर्मचारी तो कभी महीने में एक आध बार ही नजर आता है, सुबह सुबह मुँह अंधेरे एक बड़ा सा झाड़ू लिया और लग गया गली की सफ़ाई करने में । रात देर तक इटरनेट पर था। परिचर्चा में जीतु भाई ने बहस छेड़ी थी – ”मेरे सपनों का भारत” और घूमते घूमते बात पहुँच गई कि अच्छे लोग राजनीति में क्यों नही आते? हर कोई यह तर्क दे रहा था कि नेता बनना है तो गुंडागर्दी आनी चाहिए। मगर मेरा मानना है कि हमें एक इमानदार कोशिश करनी चाहिए – निस्वार्थ समाज सेवा। नेतागिरी, राजनीति और नेता तीनों की परिभाषा हमने ही तो बदलनी है।

जैसे जैसे गली के लोग जागने लगे मुझे एहसास हुआ कि महिलाए मुझे देख कर मुहँ छिपा कर हँस रही हैं। धीरे धीरे बच्चों का एक समूह मेरे पीछे एकत्र हो गया। आते जाते लोग भी नजर घुमा कर देखते और मुस्कुरा कर आगे बढ़ जाते। तभी मेरी पत्नी आ गयीं और चिल्लायीं – ये क्या तमाशा लगा रखा है गली में? मैंने हकलाते हुए बोला- गली की सेवा कर रहा हूँ। घर में टीवी पर कितनी धूल जमी है, उसे तो साफ़ करने की कभी न सोची आपने। उसने अपनी काहिली भी मेरे ऊपर उड़ेल दी। मैं गली में खड़ा बहुत ही शर्मिंदगी महसूस कर रहा था, एसा लग रहा था कि मेरे पैरों के नीचे से किसी ने जमीन ही खींच ली हो।

उठ कर दूध ले आईए वरना दूधवाले के पास समाप्त हो गया तो बिना चाय के ही आफ़िस जाना पडे़गा- फ़िर पत्नी की आवाज आई। मैं बदहवास सा उठ बैठा। बाप रे, कैसा भयावह सपना था।

मैं कीचड़ मे अपने पायजामे को संभालता चल रहा था। तीन दिन से लगातार रोज रात को बरसात हो रही थी । दूध वाले की डेयरी कालोनी के बीच में ही थी। भैंसों का गोबर बह कर नालिऒं मे रुकावट पैदा करता था जिस से जरा सी बरसात से गली में कीचड़ हो जाता था। पाँच सौ गज के प्लाट पर जबरन कब्जा कर के बनाई थी यह डेयरी। मगर दूध वाले लाला का कोई बाल भी बाँका नहीं कर सकता था। उसका बेटा देवा नेता था एरिया का। बहुत ही मुँह लगा था हमारे विधायक का। देवा का प्रापर्टी का धंधा है। टूटी फ़ूटी गली में सस्ता प्लाट खरीदते, दस बीस हजार विधाय्क जी को चड़ाते, बदले में गली की मरम्मत विधयक जी करवा देते। साफ़ गली में प्लाट डेढ़गुना दाम पर बिक जाता। सुना है कि देवा नगर निगम की टिकट की जुगाड़ में है।

रात की बात अभी मेरे मन से गयी नहीं थी। कई विचार एक साथ आ जा रहे थे मन में।

चलती गाड़ी से गोरा न होने की वजह से धकेले न गये होते तो क्या यह दुनिया वँचित हो जाती एक गाँधी जैसे नेता से?

क्या आँदोलनों में तप कर ही असली नेता बनते हैं? आरक्षण के आँदोलन में खुद को जला कर मर गए राजीव गोस्वामी। नाम भी याद है किसी को?

आज हमारे यहाँ, हिन्दुओं के नेता हैं, मुस्लामानों के नेता है, यादवों के नेता है, दलितों के नेता है। भारत का नेता कौन है?

डेयरी में घुसा तो लाला रोज की तरह उर्दू का समाचार पत्र पढ़ रहे थे।

राहुल के राजनीति में आने की बात पर मुहँ बना रहे थे लाला। कुछ और लोग भी खड़े थे दूध की इन्तजार में। राजनीति पर बहस चल रही थी। मैंने मन ही मन सोचा, राहुल गाँधी को तो साँसद हुए दो साल हो गए। माशा अल्ला अब तो बोल भी लेते हैं सँसद में। कुछ देर में अह्सास हुआ, बात राहुल महाजन की हो रही थी।

“देश को युवा नेतृत्व की बहूत आवश्यकता है। चाहे राहुल महाजन हो या राहुल गाँधी। सचिन पायलट, ज्योतिरादित्य और अमर अब्दुला जैसों से बहुत उम्मीद है देश को”- बड़ी उम्मीद से बोल रहे थे एक बुजुर्ग।

“मगर ये अर्जुन सिहँ जैसे जगह खाली करें तब ना”- लाला का नौकर दूध की बाल्टी रखते हुए कूद पड़ा था बहस में। लाला ने घूर कर देखा तो नौकर खिसक लिया।

हमने भी फ़टाफ़ट दूध लिया और तेज कदमों से चल पड़े घर की और। आज फ़िर आफ़िस में देर हो जाएगी… . . . .

नोट: यह एक कल्पनिक कथा है।
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  1. जून 2, 2006 को 5:15 अपराह्न पर | #1

    आगे बडने का रास्ता स्वयं तलाशना एवं तय करना पडता है।
    रुकावटों को हटाना पडता है।

  2. जून 11, 2006 को 7:55 अपराह्न पर | #2

    कहानी के माध्‍यम से अच्‍छा वयंग्‍य किया है आपने

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